गर्ग संहिता - 01 गोलोक धाम अध्याय 02 ब्रह्मादि देवों द्वारा गोलोक धाम का दर्शन
गर्ग संहिता - 01 गोलोक धाम अध्याय 02 ब्रह्मादि देवों द्वारा गोलोक धाम का दर्शन- (02) श्रीनारदजी कहते हैं:- जो जीभ पाकर भी कीर्तनीय भगवान श्रीकृष्ण का कीर्तन नहीं करता, वह दुर्बुद्धि मनुष्य मोक्ष की सीढ़ी पाकर भी उस पर चढ़ने की चेष्टा नहीं करता। जिह्वां लब्वा ह् पि य: कृष्णं कीर्तनीयं न कीर्तयेत्। लब्वायेत्पि मोक्षनि: श्रेणीं स नारोहति दुर्मति:॥ राजन, अब इस वाराहकल्प में धराधाम पर जो भगवान श्रीकृष्ण का पदार्पण हुआ है और यहाँ उनकी जो-जो लीलाएँ हुई हैं, वह सब मैं तुमसे कहता हूँ, सुनो… बहुत पहले की बात है, दानव, दैत्य, आसुर स्वभाव के मनुष्य और दुष्ट राजाओं के भारी भार से अत्यंत पीडित हो, पृथ्वी गौ का रूप धारण करके, अनाथ की भाँति रोती-बिलखती हुई अपनी आंतरिक व्यथा निवेदन करने के लिये ब्रह्माजी की शरण में गयी, उस समय उसका शरीर काँप रहा था। वहाँ उसकी कष्ट कथा सुनकर ब्रह्माजी ने उसे धीरज बँधाया और तत्काल समस्त देवताओं तथा शिवजी को साथ लेकर वे भगवान नारायण के वैकुण्ठधाम में गये। वहाँ जाकर ब्रह्माजी ने चतुर्भुज भगवान विष्णु को प्रणाम करके अपना सारा अभिप्राय निवेदन किया। तब ...