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07. विश्वजित खण्‍ड || अध्याय 47 || यादव सेना के साथ शक्रसख का युद्ध और उसकी पराजय

07. विश्वजित खण्‍ड || अध्याय 47 || यादव सेना के साथ शक्रसख का युद्ध और उसकी पराजय नारदजी कहते हैं- राजन् ! तदनन्‍तर महावीर प्रद्युम्न अपनी विजय दुन्‍दुभि बजवाते हुए यादव सैनिकों के साथ मधुधारा नदी के तट पर गये। सुवर्णगिरि के किनारे कुबेर के सुन्‍दर वन में, जो सुनहरे हंसों और कांचनी लतिकाओं से सम्‍पन्न है, पहुँचे ! मिथिलेश्वर ! हिमालय की गुफाएँ देवताओं के लिये दुर्ग का काम देती हैं। वहाँ दानवों की पहुँच नहीं हो पाती। वहाँ गंगा तटवर्ती बेंत की झाडियाँ छायी रहती हैं। कभी-कभी दानवों से डरकर स्‍वर्ग से भागे हुए आठों लोकपालों की निधियां वहाँ निवास करती है। शक्रसख नामक देव शिरोमणि उस प्रान्‍त के अधिपति हैं। प्रद्युम्न का आगमन सुनकर उन्‍होंने उनके साथ युद्ध करने का विचार किया। प्रद्युम्न के भेजे हुए बृद्धिमानों में श्रेष्‍ठ साक्षात उद्धव मार्गदर्शी लोगों से रास्‍ता पूछते हुए शक्रसख की नगरी में गये। सभा में पहुँचकर मन्त्रिप्रवर प्रभु उद्धव ने राजा इन्‍द्र सख को नमस्‍कार करके प्रद्युम्न की कही हुई बातें विस्‍तार के साथ कह सुनायीं। उद्धव बोले- यादवों के इन्‍द्र, द्वारकापुरी के स्‍वामी राजाधिराज उ...