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07. विश्वजितखण्‍ड || अध्याय 02 || राजा उग्रसेन के राजसूय-यज्ञ का उपक्रम, प्रद्युम्न का दिग्विजय के लिये बीड़ा उठाना और उनका विजयाभिषेक

गर्ग संहिता  07. विश्वजितखण्‍ड || अध्याय 02 || राजा उग्रसेन के राजसूय-यज्ञ का उपक्रम, प्रद्युम्न का दिग्विजय के लिये बीड़ा उठाना और उनका विजयाभिषेक बहुलाश्‍व ने पूछा- मुने ! राजा उग्रसेन ने श्रीकृष्‍ण की सहायता से रासूय-यज्ञ का किसा प्रकार विधिव‍त अनुष्‍ठान किया, यह मुझे बताइये। श्रीनारदजी ने कहा- एक समय की बात है- सुधर्मा में श्रीकृष्‍ण की पूजा करके, उन्‍हें शीश नवाकर प्रसन्नचेता राजा उग्रसेन ने दोनों हाथ जोड़कर धीरे से कहा। उग्रसेन बोले- भगवन् ! नारदजी के मुख से जिसका महान फल सुना गया है, उस राजसूय नामक यज्ञ का यदि आपकी आज्ञा हो तो अनुष्‍ठान करुँगा। पुरुषोत्तम ! आपके चरणों आपके चरणों से पहले के राजा लोग निर्भय होकर, जगत को तिनके के तुल्‍य समझकर अपने मनोरथ के महासागर को पार कर गये थे। श्रीभगवान ने कहा- राजन् ! यादवेश्‍वर ! आपने बड़ा उत्तम निश्‍चय किया है। उस यज्ञ से आपकी कीर्ति तीनों लोको में फैल जायगी। प्रभो ! सभा में समस्‍त यादवों को सब ओर से बुलाकर पान का बीड़ा रख दीजिये और प्रतिज्ञा करवाइये। समस्‍त यादव मेरे अंश से प्रकट हुए हें। वे लोक, परलोक-दोनों को जीतने की इच्‍छा करते हैं...