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04. माधुर्य खण्‍ड || अध्याय 17 || श्री यमुना का स्‍त्रोत

श्री गर्ग संहिता 04. माधुर्य खण्‍ड || अध्याय 17 || श्री यमुना का स्‍त्रोत मांधाता बोले –  मुनिश्रेष्ठ सौभरे ! सम्‍पूर्ण सिद्धि प्रदान करने वाला जो यमुना जी का दिव्‍य उत्‍तम स्‍तोत्र है, उसका कृपापूर्वक मुझसे वर्णन कीजिये। श्रीसौभरि मुनि ने कहा–  महामते ! अब तुम सूर्यकन्‍या यमुना का स्‍तोत्र सुनो, जो इस भूतल पर समस्‍त सिद्धियों को देने वाला तथा धर्म, अर्थ, काम और मोक्ष रूप चारों पुरुषार्थों का फल देने वाला है। श्रीकृष्‍ण के बायें कंधे से प्रकट हुई ‘कृष्‍णा’ को सदा मेरा नमस्‍कार है। कृष्‍णे ! तुम श्रीकृष्‍णस्‍वरूपिणी हो, तुम्‍हें बारंबार नमस्‍कार है। जो पापरूपी पंकजल के कलंग से कुत्सित कामी कुबुद्धि मनुष्‍य सत्‍पुरुषों के साथ कलह करता है, उसे भी गूँजते हुए भ्रमर और जल पक्षियों से युक्‍त कलिन्‍द‍नन्दिनी यमुना वृन्‍दावनधाम प्रदान करती हैं। कृष्‍णे ! तुम्‍हीं साक्षात श्रीकृष्‍णस्‍वरूपा हो। तुम्‍हीं प्रलयसिन्‍धु के वेगयुक्‍त भँवर में महामत्‍स्‍यरूप धारण करके विराजती हो। तुम्‍हारी उर्मि-उर्मि में भगवान कूर्मरूप से वास करते हैं तथा तुम्‍हार...