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Showing posts from June, 2021

01. गोलोक खण्ड || अध्याय 10 कंस के अत्याचार; बलभद्र जी का अवतार तथा व्यासदेव द्वारा उनका स्तवन

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गोलोक खण्ड : अध्याय 10 कंस के अत्याचार; बलभद्र जी का अवतार तथा व्यासदेव द्वारा उनका स्तवन श्री नारद जी कहते हैं-   राजन !  कंस  ने सोचा,  वसुदेवजी  भयभीत होकर कहीं भाग न जायँ- ऐसा विचार मन में आते ही उसने बहुत से सैनिक भेज दिये। कंस की आज्ञा से दस हजार शस्त्रधारी सैनिकों ने पहुँच कर वसुदेवजी का घर घेर लिया। वसुदेवजी ने यथा समय  देवकी  के गर्भ से आठ पुत्र उत्पन्न किये, वे क्रमश: एक वर्ष के बाद होते गये। फिर उन्होंने एक कन्या को भी जन्म दिया, जो भगवान की सनातनी माया थी। सर्वप्रथम जो पुत्र उत्पन्न हुआ, उसका नाम कीर्तिमान था। वसुदेवजी उसे गोद में उठाकर  कंस  के पास ले गये। वे दूसरे के प्रयोजन को भी अच्छी तरह से समझते थे, इसलिये वह बालक उन्होंने कंस को दे दिया। वसुदेव जी को अपने सत्य वचन के पालन में तत्पर देख कंस को दया आ गयी। साधु पुरुष दु:ख सह लेते हैं, परंतु अपनी कही हुई बात मिथ्या नहीं होने देते। सचाई देखकर किसके मन में क्षमा का भाव उदित नहीं होता?   कंस  ने कहा-  वसुदेवजी ! यह बालक आपके साथ ही घर लौट जाये, इससे मुझे कोई भ...

गर्ग संहिता || गोलोक खण्ड || अध्याय 09 गर्गजी की आज्ञा से देवक का वसुदेव जी के साथ देवकी का विवाह करना;

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गर्ग संहिता || गोलोक खण्ड || अध्याय 9  गर्गजी की आज्ञा से देवक का वसुदेव जी के साथ देवकी का विवाह करना; विदाई के समय आकाशवाणी सुनकर कंस का देवकी को मारने के लिये उद्यत होना और वसुदेव जी की शर्त पर जीवित छोड़ना  श्री नारद जी कहते हैं- राजन ! एक समय की बात है, श्रेष्ठ मथुरा पुरी के परम सुन्दर राजभवन में गर्गजी पधारे। वे ज्यौतिष शास्त्र के बड़े प्रामाणिक विद्वान थे। सम्पूर्ण श्रेष्ठ यादवों ने शूरसेन की इच्छा से उन्हें अपने पुरोहित के पद पर प्रतिष्ठित किया था। मथुरा से उस राजभवन में सोने के किवाड़ लगे थे, उन किवाड़ों में हीरे भी जड़े गये थे। राजद्वार पर बड़े-बड़े गजराज झूमते थे। उनके मस्तक पर झुंड़-के-झुंड़ भौंरें आते और उन हाथियों के बड़े-बड़े कानों से आहत होकर गुंजारव करते हुए उड़ जाते थे। इस प्रकार वह राजद्वार उन भ्रमरों के नाद से कोलाहल पूर्ण हो रहा था। गजराजों के गण्ड स्थल से निर्झर की भाँति झरते हुए मद की धारा से वह स्थान समावृत था। अनेक मण्डप समूह उस राजमन्दिर की शोभा बढ़ाते थे। बड़े-बड़े उद्भट वीर कवच, धनुष, ढ़ाल और तलवार धारण किये राजभवन की सुरक्षा में तत...

गर्ग संहिता || गोलोक खण्ड || अध्याय 08 सुचन्द्र और कलावती के पूर्व-पुण्य का वर्णन

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गर्ग संहिता गोलोक खण्ड : अध्याय 8 सुचन्द्र और कलावती के पूर्व-पुण्य का वर्णन, उन दोनों का वृषभानु तथा कीर्ति के रूप में अवतरण  श्रीगर्गजी कहते हैं-  शौनक ! राजा बहुलाश्व का हृदय भक्तिभाव से परिपूर्ण था। हरिभक्ति में उनकी अविचल निष्ठा थी। उन्होंने इस प्रसंग को सुनकर ज्ञानियों श्रेष्ठ एवं महाविलक्षण स्वभाव वाले देवर्षि नारद जी को प्रणाम किया और पुन: पूछा।  राजा बहुलाश्व ने कहा -  भगवन ! आपने अपने आनन्दप्रद, नित्य वृद्धिशील, निर्मल यश से मेरे कुल को पृथ्वी पर अत्यंत विशद (उज्ज्वल) बना दिया; क्योंकि श्रीकृष्ण भक्तों के क्षणभर के संग से साधारण जन भी सत्पुरुष महात्मा बन जाता है। इस विषय में अधिक कहने से क्या लाभ। श्रीराधा के साथ भूतल अवतीर्ण हुए साक्षात परिपूर्णतम भगवान ने भूतल पर अवतीर्ण हुए साक्षात परिपूर्णतम भगवान ने व्रज में कौन-सी लीलाएँ कीं- यह मुझे कृपा पूर्वक बताइये। देवर्षे ! ऋषीश्वर ! इस कथामृत द्वारा आप त्रिताप-दु:ख से मेरी रक्षा कीजिये।  श्री नारद जी कहते हैं-   राजन ! वह कुल धन्य है, जिसे परात्पर श्रीकृष्ण भक्त राजा निमि ने...

गर्ग संहिता || गोलोक खण्ड || अध्याय 07 कंस की दिग्विजय

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गर्ग संहिता गोलोक खण्ड :  अध्याय 7 कंस की दिग्विजय-शम्बर, व्योमासुर, बाणासुर, वत्सासुर, कालयवन तथा देवताओं की पराजय श्रीनारदजी कहते हैं- राजन ! तदनन्तर कंस पहले के जीते हुए प्रलम्ब आदि अन्य दैत्यों के साथ शम्बरासुर के नगर में गया। वहाँ उसने अपना युद्ध-विषयक अभिप्राय कह सुनाया। शम्बरासुर ने अत्यन्त पराक्रमी होने पर भी कंस के साथ युद्ध नहीं किया। कंस ने उन सभी अत्यंत बलशाली असुरों के साथ मैत्री स्थापित कर ली। त्रिकूट पर्वत के शिखर पर व्योम नामक एक बलवान असुर सो रहा था। कंस ने वहाँ पहुँच कर उसके ऊपर लात चलायी। उसने उठकर सुदृढ़ बँधे हुए जोरदार मुक्कों से कंस पर आघात किया। उस समय उसके नेत्र क्रोध से लाल हो रहे थे। कंस और व्योमासुर में भयंकर युद्ध छिड़ गया। वे दोनों एक-दूसरे को मुक्कों से मारने लगे। कंस के मुक्कों की मार से व्योमासुर अपनी शक्ति और उत्साह खो बैठा। उसको चक्कर आने लगा। यह देख कंस ने उसको अपना सेवक बना लिया। उसी समय मैं (नारद) वहाँ जा पहुँचा। कंस ने मुझे प्रणाम किया और पूछा- ‘हे देव ! मेरी युद्धविषयक आकांक्षा अभी पूरी नहीं हुई है। मुझे शीघ्र बताइये, अब ...

गर्ग संहिता 01 || गोलोक खण्ड || अध्याय 06 कालनेमि के अंश से उत्पन्न कंस के महान बल पराक्रम और दिग्विजय का वर्णन

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गर्ग संहिता  गोलोक खंड  अध्याय 6 कालनेमि के अंश से उत्पन्न कंस के महान बल पराक्रम और दिग्विजय का वर्णन   राजा बहुलाश्व ने कहा- देवर्षि शिरोमणे ! यह महान बल और पराक्रम से सम्पन्न कंस पहले किस दैत्य के नाम से विख्यात था ? आप इसके पूर्वजन्मों और कर्मों का विवरण मुझे सुनाइये। श्रीनारदजी कहते हैं- राजन ! पूर्वकाल में समुद्र मंथन अवसर पर महान असुर कालनेमि ने भगवान विष्णु के साथ युद्ध किया। उस युद्ध में भगवान उसे बलपूर्वक मार डाला। उस समय शुक्राचार्यजी ने अपनी संजीवनी विद्या के बल से उसे पुन: जीवित कर दिया। तब वह पुन: भगवान विष्णु से युद्ध करने के लिये मन ही मन उद्योग करने लगा। उस समय वह दानव मन्दराचल पर्वत के समीप तपस्या करने लगा। प्रतिदिन दूब का रस पीकर उसने देवेश्वर ब्रह्मा की अराधना की। देवताओं के कालमान से सौ वर्ष बीत जाने पर ब्रह्माजी उसके पास गये। उस समय कालनेमि के शरीर में केवलल हड्डियाँ रह गयी थीं और उस पर दीमकें चढ़ गयी थीं। ब्रह्माजी ने उससे कहा- ‘वर माँगो’। कालनेमि ने कहा- इस ब्रह्माण्डँ में जो-जो महाबली देवता स्थित हैं, उन सबके मूल भगवान विष्णु हैं। उन स...

01 गोलोक खंण्ड || अध्याय 05 भिन्न-भिन्न स्थानों तथा विभिन्न वर्गों की स्त्रियों के गोपी होने के कारण एवं अवतार-व्यवस्था का वर्णन

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गर्ग संहिता  गोलोक खंण्ड  अध्याय 5 भिन्न-भिन्न स्थानों तथा विभिन्न वर्गों की स्त्रियों के गोपी होने के कारण एवं अवतार-व्यवस्था का वर्णन   भगवान श्रीहरि कहते हैं- वैकुण्ठ में विराजने वाली रमादेवी की सहचरियाँ, श्वेतद्वीप की सखियाँ, भगवान अजित (विष्णु) के चरणों के आश्रित ऊर्ध्व वैकुण्ठ में निवास करने वाली देवियाँ तथा श्रीलोकाचल पर्वत पर रहने वाली, समुद्र से प्रकटित श्रीलक्ष्मी की सखियाँ- ये सभी भगवान कमलापति के वरदान से व्रज में गोपियाँ होंगी। पूर्वकृत विविध पुण्यों के प्रभाव से कोई दिव्य, कोई अदिव्य और कोई सत्त्व, रज, तम-तीनों गुणों से युक्त देवियाँ व्रजमण्डपल में गोपियाँ होगीं। रुचि के यहाँ पुत्ररूप से अवतीर्ण, द्युलोकपति रुचिर विग्रह भगवान यज्ञ को देखकर देवांगनाएँ प्रेमरस में निमग्न हो गयीं। तदनंतर वे देवलजी के उपदेश से हिमालय पर्वत पर जाकर परम भक्तिभाव से तपस्या करने लगीं। ब्रह्मन ! वे सब मेरे व्रज में जाकर गोपियाँ होंगी। भगवान धनवंतरि जब इस भूतल पर अंतर्धान हुए, उस समय सम्पूर्ण ओषधियाँ अत्यंत दु:ख में डूब गयीं और भारतवर्ष में अपने को निष्फल मानने लगीं। फिर स...

01 गोलोक खण्ड || अध्याय 04 नन्द आदि के लक्षण; गोपीयूथ का परिचय; श्रुति आदि के गोपीभाव की प्राप्ति में कारणभूत पूर्व प्राप्त वरदानों का विवरण

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गर्ग संहिता  गोलोक खण्ड  अध्याय 4 नन्द आदि के लक्षण; गोपीयूथ का परिचय; श्रुति आदि के गोपीभाव की प्राप्ति में कारणभूत पूर्व प्राप्त वरदानों का विवरण भगवान ने कहा- ब्रह्मन ! ‘सुबल’ और ‘श्रीदामा’ नाम के मेरे सखा नन्द तथा उपनन्द के घर पर जन्म धारण करेंगे। इसी प्रकार और भी मेरे सखा हैं, जिनके नाम ‘स्तोककृष्ण’, ‘अर्जुन’ एवं ‘अंशु’ आदि हैं, वे सभी नौ नन्दों के यहाँ प्रकट होंगे। व्रजमण्डल में जो छ: वृषभानु हैं, उनके गृह में विशाल, ऋषभ, तेजस्वी, देवप्रस्थ और वरूथप नाम के मेरे सखा अवतीर्ण होंगे। श्रीब्रह्माजी ने पूछा- देवेश्वर ! किसे ‘नन्द’ कहा जाता है और किसे ‘उपनन्द’ तथा ‘वृषभानु’ के क्या लक्षण हैं? श्रीभगवान कहते हैं- जो गोशालाओं में सदा गौंओं का पालन करते रहते हैं एवं गो-सेवा ही जिनकी जीविका है, उन्हें मैंने ‘गोपाल’ संज्ञा दी है। अब तुम उनके लक्षण सुनो। गोपालों के साथ नौ लाख गायों के स्वामी को ‘नन्द’ कहा जाता है। पाँच लाख गौओं का स्वामी ‘उपनन्द’ पद को प्राप्त करता है। ‘वृषभानु’ नाम उसका पड़ता है, जिसके अधिकार में दस लाख गौएँ रहती हैं, ऐसी ही जिसके यहाँ एक करोड़ॅ गौओं की ...

गर्ग संहिता - 01 गोलोक खण्ड || अध्याय 03 भगवान का अवतार लेने का निश्चय

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गर्ग संहिता - 01 गोलोक खण्ड  अध्याय 03 भगवान श्रीकृष्ण के श्रीविग्रह में श्रीविष्णु आदि का प्रवेश; देवताओं द्वारा भगवान की स्तुति; भगवान का अवतार लेने का निश्चय; श्रीराधा की चिंता और भगवान का उन्हें सांत्वना-प्रदान श्री जनकजी ने पूछा- मुने ! परात्पर महात्मा भगवान श्रीकृष्णचन्द्र का दर्शन प्राप्त कर सम्पूर्ण देवताओं ने आगे क्या किया, मुझे यह बताने की कृपा करें। श्रीनारदजी कहते हैं- राजन ! उस समय सबके देखते-देखते अष्ट भुजाधारी वैकुण्ठधिपति भगवान श्रीहरि उठे और साक्षात भगवान श्रीकृष्ण के श्रीविग्रह में लीन हो गये। उसी समय कोटि सूर्यों के समान तेजस्वी, प्रचण्ड पराक्रमी पूर्ण स्वरूप भगवान नृसिंहजी पधारे और भगवान श्रीकृष्ण तेज में वे भी समा गये। इसके बाद सहस्र भुजाओं से सुशोभित, श्वेतद्वीप के स्वामी विराट पुरुष, जिनके शुभ्र रथ में सफेद रंग के लाख घोड़े जुते हुए थे, उस रथ पर आरूढ़ होकर वहाँ आये। उनके साथ श्रीलक्ष्मीजी भी थीं। वे अनेक प्रकार के अपने आयुधों से सम्पन्न थे। पार्षदगण चारों ओर से उनकी सेवा में उपस्थित थे। वे भगवान भी उसी समय श्रीकृष्ण के श्रीविग्रह में सहसा प्रविष्ट...

गर्ग संहिता - 01 गोलोक धाम अध्याय 02 ब्रह्मादि देवों द्वारा गोलोक धाम का दर्शन

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गर्ग संहिता - 01  गोलोक धाम  अध्याय 02 ब्रह्मादि देवों द्वारा गोलोक धाम का दर्शन- (02) श्रीनारदजी कहते हैं:- जो जीभ पाकर भी कीर्तनीय भगवान श्रीकृष्ण का कीर्तन नहीं करता, वह दुर्बुद्धि मनुष्य मोक्ष की सीढ़ी पाकर भी उस पर चढ़ने की चेष्टा नहीं करता। जिह्वां लब्वा ह् पि य: कृष्णं कीर्तनीयं न कीर्तयेत्। लब्वायेत्पि मोक्षनि: श्रेणीं स नारोहति दुर्मति:॥ राजन, अब इस वाराहकल्प में धराधाम पर जो भगवान श्रीकृष्ण का पदार्पण हुआ है और यहाँ उनकी जो-जो लीलाएँ हुई हैं, वह सब मैं तुमसे कहता हूँ, सुनो… बहुत पहले की बात है, दानव, दैत्य, आसुर स्वभाव के मनुष्य और दुष्ट राजाओं के भारी भार से अत्यंत पीडित हो, पृथ्वी गौ का रूप धारण करके, अनाथ की भाँति रोती-बिलखती हुई अपनी आंतरिक व्यथा निवेदन करने के लिये ब्रह्माजी की शरण में गयी, उस समय उसका शरीर काँप रहा था। वहाँ उसकी कष्ट कथा सुनकर ब्रह्माजी ने उसे धीरज बँधाया और तत्काल समस्त देवताओं तथा शिवजी को साथ लेकर वे भगवान नारायण के वैकुण्ठधाम में गये। वहाँ जाकर ब्रह्माजी ने चतुर्भुज भगवान विष्णु को प्रणाम करके अपना सारा अभिप्राय निवेदन किया। तब ...

गर्ग संहिता - 01 || गोलोक खण्ड || अध्याय 01

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गर्ग संहिता - 01 || गोलोक खण्ड || अध्याय 01  गर्ग संहिता यदुवंशियों के आचार्य गर्ग मुनि की रचना है। इस संहिता में मधुर श्रीकृष्णलीला परिपूर्ण है तथा इसमें राधाजी की माधुर्य-भाव वाली लीलाओं का वर्णन है। श्रीमद्भगवद्गीता में जो कुछ सूत्ररूप से कहा गया है, गर्ग-संहिता में उसी का बखान किया गया है,अतः यह भागवतोक्त श्रीकृष्णलीला का महाभाष्य है। “गर्ग संहिता” गोलोक खण्ड : अध्याय 1 01- नारद- बहुलाश्व् संवाद में ‘श्रीकृष्णम माहातमय का वर्णन’। नारद जी के द्वारा अवतार-भेद का निरूपण…. नारायणं नमस्‍कृत्‍य नरं चैव नरोत्तमम्। देवीं सरस्‍वतीं व्‍यासं ततो जयमुदीरयेत्।। शरद्विकचपंकजश्रियमतीवविद्वेषकं मिलिन्‍दमुनिसेवितं कुलिशकंजचिह्नावृतम्। स्‍फुरत्‍कनकनूपुरं दलितभक्ततापत्रयं चलद्द्युतिपदद्वयं हृदि दधामि राधापते:।। वदनकमलनिर्यद् यस्‍य पीयूषमाद्यं पिबति जनवरोऽयं पातु सोऽयं गिरं मे। बदरवनविहार: सत्‍यवत्‍या: कुमार: प्रणतदुरितहार: शार्ङगधन्‍वावतार:।। ‘भगवान नारायण, नरश्रेष्ठ नर, देवी सरस्वती तथा महर्षि व्यास को नमस्कार करने के पश्चात जय (श्रीहरि की विजय गाथा से पूर्ण इतिहास पुराण) का उच्चारण ...