10. अश्वमेध खण्ड || अध्याय 44 || गोपियों का श्रीकृष्ण को खोजते हुए वंशीवट के निकट आना और श्रीकृष्ण का मानवती राधा को त्याग कर अन्तर्धान होना
10. अश्वमेध खण्ड || अध्याय 44 || गोपियों का श्रीकृष्ण को खोजते हुए वंशीवट के निकट आना और श्रीकृष्ण का मानवती राधा को त्याग कर अन्तर्धान होना वज्रनाभ बोले- ब्रह्मन ! मैंने आपके मुख से श्रीकृष्ण का अद्भुत चरित्र सुना। भगवान के अदृश्य हो जाने पर गोपियों ने क्या किया ? उन्होंने गोपांगनाओं को कैसे दर्शन दिया ? मुनिश्रेष्ठ ! मुझ श्रद्धालु भक्त को वह सारा प्रसंग सुनाइये। संसार में वे लोग धन्य हैं, जो सदा अपने कानों से श्रीकृष्ण की कथा सुनते हैं, मुख से श्रीकृष्णचंद्र के नाम जपते हैं, हाथों से प्रतिदिन श्रीकृष्ण की सेवा करते हैं, नित्य प्रति उनका ध्यान और दर्शन करते हैं तथा प्रतिदिन उन भगवान का चरणोदक पीते और प्रसाद खाते हैं। मुनिप्रवर ! इस भाव से श्रम करके जो लोग जगदीश्वर श्रीकृष्ण का भजन करते हैं, वे उनके परमधाम में जाते हैं। मुने ! जो शारीरिक सौख्य से उन्मत्त होकर संसार में नाना प्रकार के भोग भोगते हैं और श्रवण–मनन आदि साधन नहीं करते, वे शरीर का अंत होने पर भयंकर यमदूतों द्वारा पकड़े जाते हैं और जब तक सूर्य तथा चंद्रमा की स्थिति है, तब तक के लिए कालसूत्र नरक में डाल दिए जाते है।[1] सूतजी ...