10. अश्वमेध खण्ड || अध्याय 62 || गुरु और गंगा की महिमा; श्रीवज्रनाभ द्वारा कृतज्ञता-प्रकाशन और गुरुदेव का पूजन तथा श्रीकृष्ण के भजन-चिन्तन एवं गर्ग संहिता का माहात्म्य श्री
10. अश्वमेध खण्ड || अध्याय 62 || गुरु और गंगा की महिमा; श्रीवज्रनाभ द्वारा कृतज्ञता-प्रकाशन और गुरुदेव का पूजन तथा श्रीकृष्ण के भजन-चिन्तन एवं गर्ग संहिता का माहात्म्य श्री गर्गजी कहते हैं- राजन् ! जिसने पूर्वजन्म में अक्षय तप किया है, इस लोक में उसी की गुरु के प्रति भक्ति होती है। जो समर्थ होकर भी गुरु की सेवा नहीं करता, अपने गुरु को नहीं मानता, वह सदा ‘कुम्भीपाक’ नरक में गिरता है। जो गुरु के प्रति भक्ति न रखने वाले पुरुष को अपने सामने आया हुआ देख लेता है, उसे गोहत्या का पाप लगता है। वह गंगा और यमुना में स्नान करके उस पाप से शुद्ध होता है। शिष्य को जहाँ-जहाँ जितना द्रव्य उपलब्ध होता है, उसका दशांश भाग गुरु का समझना चाहिये। हमारे घर के द्रव्य में भी इसी तरह दशांश भाग गुरु का है। जो शिष्य बलपूर्वक उसे भोगता है, गुरु को अलग से निकालकर नहीं देता है, वह –‘महारौर’ नरक में जाता है और सब सुखों से वंचित हो जाता है। राजन् ! जो नित्य श्रीहरि में नवधा भक्ति करते हैं, वे अनायास ही संसार-सागर को पार कर जाते हैं। ज्ञाति (कुटुम्बीजन), विद्या, महत्व, रूप और यौवन- इसका यत्नपू...