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03. गिरिराजखण्ड || अध्याय 08 || विभिन्‍न तीर्थों में गिरिराज के विभिन्‍न अंगों की स्थित का वर्णन

श्रीगर्ग संहिता  03. गिरिराजखण्ड || अध्याय 08 || विभिन्‍न तीर्थों में गिरिराज के विभिन्‍न अंगों की स्थित का वर्णन बहुलाश्‍व ने पूछा:- महाभाग, देव, आप पर-अपर-भूत और भविष्‍य के ज्ञाताओं में सर्वश्रेष्‍ठ हैं; अत: बताइये, गिरिराज के किन-किन अंगों में कौन-कौन से तीर्थ विद्यमान हैं? श्रीनारदजी बोले:- राजन, जहाँ, जिस अंग की प्रसिद्धि है, वही गिरिराज का उत्‍तम अंग माना गया है; क्रमश: गणना करने पर कोई भी ऐसा स्‍थान नहीं है, जो गिरिराज का अंग न हो।  मानद, जैसे ब्रह्म सर्वत्र विद्यमान है और सारे अंग उसी के हैं, उसी प्रकार विभूति और भाव की दृष्टि से गोवर्धन के जो शाश्‍वत अंग माने जाते हैं, उनका मैं वर्णन करूंगा।  श्रृंगार मण्‍डल के अधोभाग में श्रीगोवर्धन का मुख्‍य है, जहाँ भगवान ने व्रजवासियों के साथ अन्‍नकूट का उत्‍सव किया था।  ‘मानसी गंगा’ गोवर्धन के दोनों नेत्र हैं, ‘चन्‍द्रसरोवर’ नासिका, ‘गोविन्‍दकुण्‍ड’ अधर और ‘श्रीकृष्‍ण कुण्‍ड’ चिबुक है।  ‘राधाकुण्‍ड’ गोवर्धन की जिह्वा और ‘ललिता सरोवर’ कपाल है।  ‘गोपालकुण्‍ड’ कान और ‘कुसुमसरोवर’ कर्णान्‍तभग है।  मिथिलेश्‍व...