10. अश्वमेध खण्ड || अध्याय 27 || यादवों द्वारा समुद्र पर बाणमय सेतु का निर्माण
10. अश्वमेध खण्ड || अध्याय 27 || यादवों द्वारा समुद्र पर बाणमय सेतु का निर्माण श्रीगर्ग कहते हैं- महाराज ! तत्पश्चात् यादवराज अनिरुद्ध ने उद्धवजी को बुलाकर गंभीर वाणी में पूछा– साधु शिरोमणे ! पाञ्चजन्य द्वीप कितनी दूर है, जिसमें उस दैत्य ने मेरा घोड़ा ले जाकर रखा है ? उनका यह प्रश्न सुनकर श्रीकृष्ण के मंत्री, सुहृद् और सखा उद्धव मन ही मन श्रीकृष्ण चरणारविंदों का चिंतन करके यदुकुल नंदन अनिरुद्ध से बोले- भगवन ! सर्वज्ञ ! प्रभो ! लोकेश ! मैं आपकी बात का गौरव रखने के लिए मार्ग में जैसा सुना है, वैसा बता रहा हूँ। नृपेश्वर ! तीस योजन विस्तृत सागर के उस पार दक्षिण दिशा में पाञ्चजन्य नामक उपद्वीप है। उद्धव की बात सुनकर बलवान, धैर्यशाली तथा धनुर्धरों में श्रेष्ठ अनिरुद्ध रोष और उत्साह से भरकर श्रेष्ठ यादव वीरों से बोले। अनिरुद्ध ने कहा– श्रेष्ठतम वीर यादवों ! मैं समुद्र के पार जाऊँगा। इसलिए तुम लोग शीघ्र ही बाणों द्वारा समुद्र के ऊपर सेतु का निर्माण करो उनकी यह बात सुनकर युद्ध कुशल यादव परस्पर हंसते हुए समुद्र के ऊपर बाणों की वर्षा करने लगे। तब समस्त जलचर जंतु तीखें बाणों से घायल ह...