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07. विश्वजित खण्‍ड || अध्याय 45 || रागिनियों तथा राग-पुत्रों द्वारा भगवान श्रीकृष्‍ण का स्‍तवन और उनका द्वारकापुरी के लिये प्रस्‍थान

07. विश्वजित खण्‍ड || अध्याय 45 || रागिनियों तथा राग-पुत्रों द्वारा भगवान श्रीकृष्‍ण का स्‍तवन और उनका द्वारकापुरी के लिये प्रस्‍थान श्रीनारदजी कहते है- राजन ! तदनन्‍तर भैरव आदि रागगण भगवान श्रीहरि के सामने उपस्थित हुए और रूप के अनुरूप उनके प्रत्‍येक अवयव का दर्शन करके अत्‍यन्‍त हर्षित हुए। श्रीहरि के विग्रह में जिस जिस अंग पर उनकी दृष्‍टि‍ पड़ती थी, वहीं वहीं वह ठहर जाती थी। लवणीय विशेष का अनुभव करके वह वहाँ से हटने में समर्थ नहीं होती थी। भगवान श्रीकृष्‍णचन्‍द्र के उस अत्‍यन्‍त अद्भुत रूप का दर्शन करके वे भी पृथक-पृथक उसका गुणगान करने लगे। भैरव बोला- श्रीहरि के दोनों घुटनों का चिन्‍तन करो, जिन्‍हें सदा अंक में लेकर कमला अपने कमलोपम करों से उनकी सेवा करती हैं।  मेघमल्लार ने कहा- सर्वव्‍यापी भगवान श्रीकृष्‍ण की दोनों जांघें, मानो कदली खण्‍ड हैं, सोने के खंभे हैं, तेज से पूर्ण हैं, अनुपम शोभा से सम्‍पन्न हैं तथा पीताम्‍बर से ढकी हुई हैं। उन दोनों वन्‍दनीय ऊरु युगल का मैं ध्‍यान करता हूँ।  दीपक राग ने कहा- भगवान के कटिभाग से नीचे जो सम्‍पूर्ण चरण हैं, वे समस्‍त सुखों को देने वा...