04. माधुर्य खण्ड || अध्याय 03 || मैथिलीरूपा गोपियों का आख्यान, चीरहरणलीला और वरदान प्राप्ति
श्री गर्ग संहिता 04. माधुर्य खण्ड || अध्याय 03 || मैथिलीरूपा गोपियों का आख्यान, चीरहरणलीला और वरदान प्राप्ति श्रीनारदजी कहते हैं:- राजन मिथिलेश्वर, अब मिथिला देश में उत्पन्न गोपियों का आख्यान सुनो, यह दशाश्व मेध-तीर्थ स्नान का फल देने वाला और भक्ति-भाव को बढ़ाने वाला है। श्रीरामचन्द्र जी के वर से जो नौ नन्दों के घरों में उत्पन्न हुई थीं, वे मैथिलीरूपा गोपकन्याएँ परम कमनीय नन्दनन्दन का दर्शन करके मोहित हो गयीं। उन्होनें मार्गशीर्ष के शुभ मास में कात्यायनी का व्रत किया ओर उनकी मिट्टी की प्रतिमा बनाकर वे षोडशोपचार से उसकी पूजा करने लगीं। अरूणोदय की वेला में वे प्रतिदिन एक साथ भगवान के गुण गाती हुई आतीं और श्रीयमुनाजी के जल में स्नान करती थीं। एक दिन वे व्रजांगनाएं अपने वस्त्र यमुनाजी के किनारे रखकर उनके जल में प्रविष्ट हुई और दोनों हाथों से जल उलीचकर एक-दूसरी को भिगोती हुई जल-विहार करने लगीं। प्रात:काल भगवान श्यामसुन्दर वहाँ आये और तुरंत उन सबके वस्त्र लेकर कदम्ब पर आरूढ़ हो चोर की तरह चुपचाप बैठ गये। राजन, अपने वस्त्...