10. अश्वमेध खण्ड || अध्याय 09 || गर्गाचार्य का द्वारकापुरी में आगमन तथा अनिरूद्ध का अश्वमेधीय अश्व की रक्षा के लिए कृतप्रतिज्ञ होना
10. अश्वमेध खण्ड || अध्याय 09 || गर्गाचार्य का द्वारकापुरी में आगमन तथा अनिरूद्ध का अश्वमेधीय अश्व की रक्षा के लिए कृतप्रतिज्ञ होना श्रीगर्गजी कहते हैं- राजन ! तदनन्तर द्वारकापुरी में देवर्षिप्रवर नारदजी के चले जाने पर राजाधिराज उग्रसेन ने मुझे बुलाने के लिए अपने दूतों को भेजा। उग्रसेन के वे दूत मेरे सामने आकर इस प्रकार बोले। दूतों ने कहा- देवदेव ! ब्रह्मन ! भूदेव-शिरोमणे ! मुने ! कृपया हमारी सारी बातें विस्तारपूर्वक सुनिये- मुनेश्वर ! द्वारका में भगवान श्रीकृष्ण की इच्छा से आपके बुद्धिमान शिष्य महाराज उग्रसेन ने क्रतुश्रेष्ट अश्वमेध के अनुष्ठान का निश्चय किया है, मुने ! उस यज्ञ-महोत्सव में आप शीघ्र पधारें। उन दूतों का यह कथन सुनकर मैं गर्गाचल से द्वारकापुरी की ओर चला। नृपश्रेष्ठ ! उस यज्ञ को देखने के लिए मेरे मन में बड़ा कौतूहल था। तदनन्तर आनर्तदेश में दूर से ही मुझे द्वारकापुरी दिखायी दी, जो नाना प्रकार के वृक्षों तथा अनेकानेक उपवनों से सुशोभित थी। बहुत-से सरोवर, बावलियाँ तथा नाना प्रकार के पक्षी उस पुरी की शोभा बढ़ा रहे थे। नृपेश्वर ! वहाँ के सरोव...