09. श्रीविज्ञान खण्ड || अध्याय 06 || मन्दिर निर्माण तथा विग्रह प्रतिष्ठा एवं पूजा की विधि
09. श्रीविज्ञान खण्ड || अध्याय 06 || मन्दिर निर्माण तथा विग्रह प्रतिष्ठा एवं पूजा की विधि राजा उग्रसेन ने पूछा- मुने ! गृहस्थ कर्म-ग्रह से ग्रस्त रहता हैं। ऐसी कौन-सी विधि है, जिसके द्वारा यह कर्मासक्त गृहस्थ महात्मा श्रीकृष्ण की सेवा कर सके उसे कहने की कृपा कीजिये। (साथ ही यह भी बताइये कि) जिसके जीवन में भक्ति का अंकुर की नहीं है अथवा है तो बढ़ता नहीं, ऐसे व्यक्ति स्वयं श्रीहरि किस प्रकार प्रसन्न हो सकते हैं। श्रीव्यासजी बोले- यदि भक्ति का अंकुर न हो तो सत्पुरुषों संग करना चाहिये। सत्संग से वह अंकुर उत्पन्न हो सकता है और वेग से बढ़ भी जाता है। राजन् ! भगवान श्रीकृष्ण के सेवन की विधि, जिसके प्रभाव से यह गृहस्थ भी शीघ्र भगवान श्रीकृष्ण को प्राप्त कर सकता है और जो अत्यन्त सुलभ है, वह तुम्हें मैं बतलाता हूँ। जिनकी आचार्य के सत्कुल में उत्पति हुई हो तथा जो भगवान श्रीकृष्ण के ध्यान में तत्पर हों, उनको गुरु बनाकर मनुष्य सिद्धि पाता है। मनुष्य को चाहिये कि वह ऐसे गुरु से महात्मा श्रीकृष्ण की सेवा-विधि सीखे। जो भगवान विष्णु की दीक्षा से रहित है, उसका सब कुछ निष्...