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02. वृन्दावन खण्ड || अध्याय 17 || श्रीकृष्ण का गोपदेवी के रूप से वृषभानु-भवन में जाकर श्रीराधा से मिलना

श्री गर्ग संहिता 02. वृन्दावन खण्ड || अध्याय 17 || श्रीकृष्ण का गोपदेवी के रूप से वृषभानु-भवन में जाकर श्रीराधा से मिलना राजा बहुलाश्व बोले:- मुने, श्रीराधाकृष्ण के चरित्र को सुनते-सुनते मेरा मन अघाता नहीं- ठीक उसी तरह जैसे शरद ऋतु के प्रफुल्ल कमल का रसपान करते समय भ्रमरों को तृप्ति नहीं होती।  ब्रह्मन, तपोधन, श्रीकृष्ण पत्नि रासेश्वरी द्वारा तुलसी-सेवन का व्रत पूर्ण कर लिये जाने के बाद जो वृत्तांत घटित हुआ, वह मुझे सुनाइये। श्री नारद जी ने कहा:- राजन, श्रीराधिका की तुलसी सेवन सेवा के निमित्त की गयी तपस्या को जानकर, उनकी प्रीति की परीक्षा लेने के लिये एक दिन भगवान श्रीकृष्ण वृषभानुपुर में गये।  उस समय उन्होंने अद्भुत गोपांगना का रूप धारण कर लिया था।  चलते समय उनके पैरों से नूपुरों की मधुर झनकार हो रही थी। कटि की करधनी में लगी हुई क्षुद्रघण्टिकाओं की भी मधुर खनखनाहट सुनायी पड़ती थी।  अंगुलियों में मुद्रिकाओं की अपूर्व शोभा थी, कलाइयों में रत्न जटित कंगन, बाँहों में भुजबन्द तथा कण्ठ एवं वक्ष:स्थल में मोतियों के हार शोभा दे रहे थे।  बाल रवि के समान दीप्तिमान शीशफूल...