01. गोलोक खण्ड || अध्याय 13 || पूतना का उद्धार
गर्ग संहिता 01. गोलोक खण्ड || अध्याय 13 || पूतना का उद्धार श्री नारद जी कहते हैं- राजन ! नन्दजी राजा कंस का कर चुकाने, वासुदेव जी की कुशल पूछने और उन्हें अपने यहाँ के पुत्रोत्सव का समाचार देने के लिये मथुरा चले गये। उसे समय कंस की भेजी हुई बालघातिनी दुष्टा राक्षसी पूतन नगरों, गाँवों और गोष्ठों में विचरती हुई गोप और गोपियों से भरे हुए गोकुल में आ पहुँची। उसकी नाक से साँस के साथ ‘घर्घर’ शब्द होता था। गोकुल के निकट आने पर उसने माया से दिव्य रूप धारण कर लिया। वह सोलह वर्ष की अवस्था वाली तरूणी बन गयी। उसका सौन्दर्य इतना दिव्य था कि वह अपनी अंगकांति से शची, सरस्वती, लक्ष्मी, रम्भा तथा रति को भी तिरस्कृत कर रही थी। चलते समय उसके उन्नत कुच दिव्य आभा से झलकते और हिलते थे। उसे देखकर रोहिणी तथा यशोदा भी हतप्रतिभ हो गयीं। उसने आते ही बाल गोपाल को गोद में ले लिया और बारंबार लाड़ लड़ाती हुई उस महाघोर दानवी ने शिशु के मुख में हलाहल विष से लिप्त अपना स्तन दे दिया। यह देख तीक्ष्ण रोष से आवृत हो श्रीहरि ने उसका सारा दूध उसके प्राणों सहित ...