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01. गोलोक खण्ड || अध्याय 17 || श्रीकृष्ण की बाल-लीला में दधि-चोरी का वर्णन

01. गोलोक खण्ड || अध्याय 17 || श्रीकृष्ण की बाल-लीला में दधि-चोरी का वर्णन श्रीनारदजी कहते हैं-  राजन ! तदनन्तर बलराम और श्रीकृष्ण। दोनों गौरश्याम मनोहर बालक विविध लीलाओं से नन्दनभवन को अत्यन्त सुन्दर एवं आकर्षक बनाने लगे। मिथिलेश्वरर ! वे दोनों हाथों और घुटनों के बल से चलते हुए और मीठी-तोतली बोली बोलते हुए थोडे़ ही समय में व्रज में इधर-उधर डोलने लगे। माता यशोदा और रोहिणी के द्वारा लालित-पालित वे दोनों शिशु, कभी माताओं की गोद से निकल जाते और कभी पुन: उनके अंक में आ बैठते थे। माया के बालरूप धारण करके त्रिभुवन को मोहित करने वाले वे दोनों भाई, राम और श्याम, इधर-उधर मञ्जीर और करधनी की झंकार फैलाते फि‍रते थे। माता यशोदा व्रज बालकों के साथ आंगन में खेलते-लोटते तथा धूल लग जाने से धूसर अंग वाले अपने लाला को गोद में लेकर बडे़ आदर से झाड़ती- पोंछती थीं। श्रीकृष्ण दोनों हाथों और घुटनों के बल चलते हुए पुन: आंगन में चले जाते और वहाँ से फि‍र माता की गोद में आ जाते थे। इस प्रकार वे व्रज में सिंह-शावक की भाँति लीला कर रहे थे। माता यशोदा उन्हें सोने के तावीज ...