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10. अश्‍वमेध खण्‍ड || अध्याय 04 || पारि‍जात हरण

10. अश्‍वमेध खण्‍ड || अध्याय 04 || पारि‍जात हरण श्रीगर्गजी कहते हैं- राजन ! स्‍वर्ग में जाकर इन्‍द्र को उनका छत्र और मणि‍ देकर श्रीकृष्‍ण ने माता अदि‍ति‍ को उनके दोनों कुण्‍डल अर्पि‍त कर दि‍ये। उसके बाद अपना अभि‍प्राय व्‍यक्‍त कि‍या। श्रीहरि‍ के अभि‍प्राय को जानकर भी जब इन्‍द्र ने पारि‍जात वृक्ष नहीं दि‍या, तब माधव ने देवताओं को पराजि‍त करके पारि‍जात को बलपूर्वक अपने अधि‍कार में ले लि‍या। सूतजी कहते हैं- शौनक ! यह कथा सुनकर यादवनरेश वज्र को बड़ा वि‍स्‍मय हुआ। श्रीहरि‍ के गुणों का श्रद्धा रखते हुए उन्‍होंने पुन: अपने गुरु से पूछा- ‘ब्रह्मन ! इन्‍द्र तो देवताओं के राजा हैं। वे यह जानते हैं कि‍ श्रीकृष्‍ण साक्षात परमेश्‍वर श्रीहरि‍ हैं, तथापि‍ उनहोंने भगवान के प्रति‍ अपराध कैसे कि‍या ? यह ठीक-ठीक बताइये। इन्‍द्र की चेष्‍टा को सत्‍यभामा ने पहले ही भांप लि‍या था और श्रीकृष्‍ण के सामने सुस्‍पष्‍ट बता दि‍या था। अत: इस प्रसंग को सुनने के लि‍ये मेरे मन में बड़ी उत्‍कण्‍ठा है। आप इन्‍द्र और माधव के इस युद्ध का मेरे समक्ष वि‍स्‍तारपूर्वक वर्णन कीजि‍ये। श्रीगर्गजी बोले- राजन ! अदि‍ति‍ ने भगवान श...