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10. अश्‍वमेध खण्‍ड || अध्याय 36 || श्रीकृष्ण पुत्र सुनंदन द्वारा दैत्यपुत्र कुनन्दन का वध

10. अश्‍वमेध खण्‍ड || अध्याय 36 || श्रीकृष्ण पुत्र सुनंदन द्वारा दैत्यपुत्र कुनन्दन का वध श्रीगर्गजी कहते हैं- राजन ! इसी समय कुनन्दन भी मूर्च्छा त्यागकर रथारूढ़ हो क्रोधपूर्वक धनुष से बाणों की वर्षा करता हुआ युद्धस्थल में आया। शत्रुवीरों का नाश करने वाले वीर अनिरुद्ध उसको आया देख रोष से आग बबूला हो उठे और अपने सेवकों से उसकी बात पूछने लगे। सेवकों ने कहा– महाराज ! यह बल्वल नंदन कुनन्दन है और आपके साथ युद्ध करने आया है। यह सुन कर अनिरुद्ध बोले– मैं कुनन्दन को मार डालूँगा। उसी समय श्रीकृष्ण पुत्र सुनन्दन ने उनसे कहा । सुनंदन बोले- राजन् ! यह दैत्य पुत्र क्या है ? तथा इसकी यही थोड़ी सी सेना क्या बिसात रखती है। प्रभो ! मैं आपके प्रताप से इसके जीत लूँगा। अत: मैं ही युद्ध के लिए जाता हूँ। राजन् ! मेरी प्रतिज्ञा सुनिए। यह आपके लिए आनंददायिनी होगी– यदि मैं अधिक संग्राम कुशल कुनन्दनको न जीत लूँ तो श्रीकृष्ण के चरणारविंदों के मकरन्द का आस्वादन करने से विरत रहने वाले मनुष्यों को जा पाप लगता है, वही मुझे भी लगे। यदि मैं इस दानव को परास्त कर दूं तो भवबंधन हर लेने वाले गुरु और पिताजी की सेवा में व...