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02. वृन्दावन खण्ड || अध्याय 06 || अघासुर का उद्धार और उसके पूर्वजन्म का परिचय

श्री गर्ग संहिता  02. वृन्दावन खण्ड || अध्याय 06 || अघासुर का उद्धार और उसके पूर्वजन्म का परिचय श्री नारद जी कहते हैं:- राजन, एक दिन ग्वाल-बालों के साथ बछड़े चराते हुए श्री हरि कालिन्दी के निकट किसी रमणीय स्थान पर बालोचित खेल खेलने लगे।  उसी समय अघासुर नामक महान दैत्य एक कोस लंबा शरीर धारण करके भीषण मुख को फैलाये वहाँ मार्ग में स्थित हो गया, दूर से ऐसा जान पड़ता था, मानो कोई पर्वत खड़ा हो।  वृन्दावन में उसे देखकर सब ग्वाल-बाल ताली बजाते हुए बछड़ों के साथ उसके मुँह में घुस गये। उन सबकी रक्षा के लिये बलराम सहित श्रीकृष्ण भी अघासुर के मुख में प्रविष्ट हो गये। उस सर्परूपधारी असुर ने जब बछड़ों और ग्वाल-बालों को निगल लिया, तब देवताओं में हाहाकार मच गया; किंतु दैत्यों के मन में हर्ष ही हुआ।  उस समय श्रीकृष्ण ने अघासुर के उदर में अपने विराट स्वरूप को बढ़ाना आरम्भ किया। इससे अवरूद्ध हुए अघासुर के प्राण उसका मस्तक फोड़कर बाहर निकल गये।  मिथिलेश्वर, फिर बालकों और बछड़ों के साथ श्रीकृष्ण अघासुर के मुख से बाहर निकले। जो बछड़े और बालक मर गये थे, उन्हें माधव ने अपनी कृपा-दृष्ट...