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06. द्वारकाखण्ड || अध्याय 06 || श्रीकृष्‍ण द्वारा रुक्मिणी का अपहरण तथा यादव-वीरों के साथ युद्ध

06. द्वारकाखण्ड || अध्याय 06 || श्रीकृष्‍ण द्वारा रुक्मिणी का अपहरण तथा यादव-वीरों के साथ युद्ध में विपक्षी राजाओं की पराजय श्रीनारदजी कहते हैं-  राजन् ! इस प्रकार ब्राह्मणपत्नियों के शुभाशीर्वाद से अभिनन्दित हो  रुक्मिणी  पुन: बार-बार देवी तथा विप्र-वधुओं को प्रणाम किया।  तत्‍पश्‍चात मौनव्रत का त्‍याग करके भीष्‍मक राजकुमारी सखी-सहेलियों के साथ धीरे-धीरे गिरिजागृह से बाहर निकली। उस समय करोड़ों चन्‍द्रमाओं के समान कान्तिमती कमललोचना रुक्मिणी को वीर योद्धाओं अकस्‍मात इस प्रकार देखा, मानो निर्धनों को सहसा कोई उत्तम निधि मिल गयी हो। घुड़सवार, रथी, हाथीवार और पैदल- जो–जो रक्षक वहाँ आये थे, वे सब  रुक्मिणी  पर दृष्टि पड़ते ही मोहित हो गये। उसके मुस्‍कानयुक्‍त कटाक्ष  कामदेव  के धनुष से छूटे हुए तीखे बाणें के समान थे। उनसे आहत एवं पीड़ित हो समस्‍त सैनिक अपने अस्‍त्र त्‍यागकर  पृथ्‍वी  पर गिर पड़े । इसी समय घंटियों और मँजीरों के नाद से मुखरित तथा वैकुण्‍ठस्थि‍त नै:श्रयस नामक वन उद्धत अश्‍वों से जुते हुए, फहराती हुई ऊँची मताका से अलंकृत तथा...