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02. वृन्दावन खण्ड || अध्याय 24 || रास-विहार तथा आसुरि मुनि का उपाख्यान

श्री गर्ग संहिता 02. वृन्दावन खण्ड || अध्याय 24 || रास-विहार तथा आसुरि मुनि का उपाख्यान नारद जी कहते हैं:- तदनंतर गोपिणों के साथ यमुनातट का दृश्य देखते हुए श्याम सुन्दर श्रीकृष्ण रास-विहार के लिये मनोहर वृन्दावन में आये। श्री हरि के वरदान से वृन्दावन की ओषधियाँ विलीन हो गयीं और वे सब-की-सब व्रजांगना होकर, एक यूथ के रूप में संघटित हो, रासगोष्ठी में सम्मिलित हो गयीं।  मिथिलेश्वर, लतारूपिणी गोपियों का समूह विचित्र कांति से सुशोभित था; उन सबके साथ वृन्दावनेश्वर श्री हरि वृन्दावन में विहार करने लगे।  कदम्ब-वृक्षों से आच्छादित कालिन्दी के सुरम्य तट पर सब ओर शीतल, मन्द, सुगन्ध वायु चलकर उस स्थान को सुगन्धपूर्ण कर रही थी; वंशीवट उस सुन्दर पुलिन की रमणीयता को बढ़ा रहा था।  रास के श्रम के थके हुए श्रीकृष्ण वहीं श्रीराधा के साथ आकर बैठे।  उस समय गोपांगनाओं के साथ-साथ आकाशस्थित देवता भी वीणा, ताल, मृदंग, मुरचंग आदि भाँति-भाँति के वाद्य बजा रहे थे तथा जय-जयकार करते हुए दिव्य फूल बरसा रहे थे।  गोप-सुन्दरियाँ श्री हरि को आनन्द प्रदान करती हुई उनके उत्तम यश गाने लगी; कुछ गोपिया...