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07. विश्वजित खण्‍ड || अध्याय 17 || मगध देश पर यादवों की विजय तथा मगधराज जरासंध की पराजय

07. विश्वजित खण्‍ड || अध्याय 17 ||  मगध देश पर यादवों की विजय तथा मगधराज जरासंध की पराजय श्रीनारदजी कहते हैं-  राजन्! तदनन्‍तर मत्‍स्‍य के चिन्‍ह से सु‍शोभित ध्‍वजा फहराते हुए प्रद्युम्न  मगधदेश पर विजय पाने के लिये अपनी सेना के साथ तुरंत गिरिवज्र की ओर चल दिये। श्रीहरि के पुत्र प्रद्युम्न को, विशेषत: दिग्विजय के लिये, आया सुनकर मगध राजा जरासंध को बड़ा क्रोध हुआ। जरासंध बोला-  समस्‍त यादव अत्‍यन्‍त तुच्‍छ और युद्ध से डरने वाले कायर हैं। वे ही आज पृथ्वी पर विजय पाने के लिये निकले हैं। जान पड़ता है, उनकी बुद्धि मारी गयी है। इस दुरात्‍मा प्रद्युम्न का पिता माधव स्‍वयं मेरे भय से अपनी पूरी मथुरा छोड़कर समुद्र की शरण में जा छिपा है। प्रवर्षण गिरि पर मैंने बलराम और कृष्ण को बलपूर्वक भस्‍म कर दिया था, किंतु ये छलपूर्वक वहाँ से भाग निकले और द्वारका में जाकर रहने लगे। अब मैं स्‍वयं कुशलस्‍थली पर चढ़ाई करुँगा और उन दोनों भाइयों को उग्रसेन सहित बांध लाऊँगा। समुद्र से घिरी हुई इस पृथ्वी को यादवों से शून्‍य कर दूँगा। नारदजी कहते हैं-  ...