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06. द्वारकाखण्ड || अध्याय 19 || लीला-सरोवर, हरिमन्दिर, ज्ञानतीर्थ, कृष्‍ण-कुण्‍ड, बलभद्र-सरोवर, दानतीर्थ, गणपति तीर्थ और मायातीर्थ आदि का वर्णन

06. द्वारकाखण्ड || अध्याय 19 || लीला-सरोवर, हरिमन्दिर, ज्ञानतीर्थ, कृष्‍ण-कुण्‍ड, बलभद्र-सरोवर, दानतीर्थ, गणपति तीर्थ और मायातीर्थ आदि का वर्णन श्रीनारदजी कहते हैं- राजन्! द्वारावती मण्‍डल सौ योजन विस्‍तृत है। उनकी पूरी परिक्रमा चार सौ योजनों की है। उसके बीच में श्रीकृष्‍ण निमित दुर्ग बारह योजन विस्‍तृत है। दूसरा बाहरी दुर्ग नब्‍बे कोसों में महात्‍मा श्रीकृष्‍ण द्वारा निर्मित हुआ है, जो शत्रुओं के लिये दुर्लंघय है। राजन! तीसरा बाहरी दुर्ग दो कम दो सौ कोसों में सं‍घटित हुआ है, जिसमें रत्‍नमय प्रासादों का निर्माण हुआ था। इनके अन्‍तर्दुर्ग भी महात्‍मा श्रीकृष्‍ण के नौ लाख विचित्र मन्दिर हैं।  वहाँ राधा-मन्दिर के द्वार पर ‘लीला-सरोवर’ है जो समस्‍त तीर्थों में उत्तम माना गया है। राजन ! उसका गोलोक से आगमन हुआ है। उसमें स्‍नान करके व्रत धारणपूर्वक एकाग्रचित्त हो, अष्‍टमी तिथि को विधिवत सुवर्ण का दान दे, तीर्थ को नमस्‍कार करे तो पापी मनुष्‍य भी कोटिजन्‍मों के किये हुए पापों से मुक्‍त हो जाता है- इसमें संशय नहीं है। प्राणान्‍त होने पर उस मनुष्‍य को लेने के लिये निश्‍चय ही गोलोक से एक व...