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07. विश्वजित खण्‍ड || अध्याय 26 || किम्‍पुरुष वर्ष के रंगवल्‍लीपुर में किम्‍पुरुषों द्वारा हरिचरित्र का गान; वहाँ के राजा द्वारा भेंट पाकर यादव सेना का आगे जाना; मार्ग में अजगररूपधारी शापभ्रष्‍ट गन्‍धर्व का उद्धार; वसन्‍त तिल का पुरी के राजा श्रृंगार तिलक को पराजित करके प्रद्युम्न का हरिवर्ष के लिये प्रस्‍थान

07. विश्वजित खण्‍ड || अध्याय 26 ||   किम्‍पुरुष वर्ष के रंगवल्‍लीपुर में किम्‍पुरुषों द्वारा हरिचरित्र का गान; वहाँ के राजा द्वारा भेंट पाकर यादव सेना का आगे जाना; मार्ग में अजगररूपधारी शापभ्रष्‍ट गन्‍धर्व का उद्धार; वसन्‍त तिल का पुरी के राजा श्रृंगार तिलक को पराजित करके प्रद्युम्न का हरिवर्ष के लिये प्रस्‍थान श्री नारदजी कहते हैं-  राजन् ! तदनन्‍तर। प्रद्युम्न दिव्‍य वृक्षों और दिव्‍य लताओं से व्‍याप्‍त तथा सहस्‍त्र दल कमलों से अलंकृत सरोवरों द्वारा सुशोभित दूसरे-दूसरे देशों की ओर गये। प्रचण्‍ड पराक्रमी प्रद्युम्न सौ अक्षैहिणी सेना के साथ यक्षों द्वारा बताये हुए मार्ग से किम्‍पुरुष में गये। वहाँ हेमकूट गिरि की तराई में रंगवल्‍लीपुर है। वहाँ के निवासी किम्‍पुरुष शम्‍बरारि प्रद्युम्न के सुनते हुए कह रहे थे । किम्‍पुरुष कहते थे- अहो ! पुरियों में श्रेष्‍ठ मथुरापुरी अत्‍यन्‍त धन्‍य है, जिसमें साक्षात परमेश्वर हरि ने अवतार लिया है। अहो ! यदुकुल सदा ही परम धन्‍य है, जिसमें समस्‍त ब्रह्माण्‍ड के पालक श्रीहरि का प्रादुर्भाव हुआ है। शत्रु पुत्र वसुदेव का वह निवास...