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10. अश्‍वमेध खण्‍ड || अध्याय 59A || गर्गाचार्य के द्वारा राजा उग्रसेन के प्रति भगवान श्रीकृष्‍ण के सहस्रनामों का वर्णन (1 से 250 तक)

10. अश्‍वमेध खण्‍ड || अध्याय 59A || गर्गाचार्य के द्वारा राजा उग्रसेन के प्रति भगवान श्रीकृष्‍ण के सहस्रनामों का वर्णन (1 से 250 तक) श्रीगर्गजी कहते हैं-  राजन ! तब राजा उग्रसेन ने पुत्र की आशा छोड़कर सम्पूर्ण विश्‍व को मन का संकल्प मात्र जानकर व्‍यासजी से अपना संदेह पूछा- ‘ब्रह्मन ! किस प्रकार से लौकिक सुख का परित्याग करके मनुष्‍य परब्रह्म परमात्मा श्रीकृष्‍ण का भजन करे, यह मुझे विश्‍वासपूर्वक बताने की कृपा करें। व्‍यासजी बोले-  महाराज उग्रसेन ! मैं तुम्हारे सामने सत्य और हितकर बात कह रहा हूँ, इसे एकाग्रचित्त होकर सुनो। राजेन्‍द्र ! तुम श्रीराधा और श्रीकृष्‍ण की उत्कृष्‍ट आराधना करो। इन दोनों के पृथक-पृथक सहस्‍त्र भाव से भजन करो। भूपते ! राधा के सहस्र नाम को ब्रह्मा, शंकर, नारद और कोई-कोई मेरे- जैसे- लोग भी जानते हैं। उग्रसेन ने कहा-  ब्रह्मन ! मैंने पूर्वकाल में सूर्यग्रहण के अवसर पर कुरुक्षेत्र के एकान्त दिव्य शिविर में नारदजी के मुख से ‘राधिकासहस्रनाम’ का श्रवण किया था, परंतु अनायास ही महान कर्म करने वाले भगवान श्रीकृष्‍ण के सहस्‍त्र नाम को मैंने नहीं सुना है। अत: कृप...