10. अश्वमेध खण्ड || अध्याय 24 || अनुशाल्व और यादव वीरों में घोर युद्ध
10. अश्वमेध खण्ड || अध्याय 24 || अनुशाल्व और यादव वीरों में घोर युद्ध श्रीगर्गजी कहते हैं- राजन् ! सान्दीपनि मुनि का यह वचन सुनकर अनिरुद्ध को बड़ी प्रसन्नता हुई। उन्होंने भगवान श्रीकृष्णचंद्र के चरणों में अपना मन लगाकर उन मुनीश्वर से कहा– प्रभो ! आपके उपदेश रूपी खड्ग से मेरा मोहरूपी शत्रु नष्ट हो गया। अब आप आज ही अपने पुत्र के साथ श्रीकृष्णपुरी द्वारका को पधारिए। उनकी यह बात सुनकर सान्दीपनि मुनि प्रसन्नतापूर्वक श्रीकृष्ण के दिए हुए पुत्र के साथ रथ पर बैठ कर द्वारका पुरी को गए। द्वारकापुरी में बलराम और श्रीकृष्ण ने बड़े आदर के साथ उन्हें ठहराया। समस्त यादवों तथा भोजराज उग्रसेन ने विधिपूर्वक उनका पूजन किया। इधर प्रद्युम्न कुमार अनिरुद्ध ने सोने की सांकल में बंधे हुए अत्यंत उज्ज्वल श्याम कर्ण अश्व को विजय यात्रा के लिए खोल दिया। वह घोड़ा राजाधिराज उग्रसेनदेव का वैभव सूचित करता हुआ वेगपूर्वक आगे बढ़ा और उस राजपुर में चला गया, जहाँ शाल्व का भाई राजा अनुशाल्व नित्य राज्य करता था। स्वेच्छानुसार वहाँ पहुँचे हुए अश्व को अनुशाल्व ने पकड़ लिया और उसके भाल में बंधे हुए पत्र को बांचा। बांचक...