06. द्वारकाखण्ड || अध्याय 15 || यज्ञतीर्थ, कपिटंकतीर्थ, नृगकूप, गोपीभूमि तथा गोपीचन्दन की महिमा
06. द्वारकाखण्ड || अध्याय 15 || यज्ञतीर्थ, कपिटंकतीर्थ, नृगकूप, गोपीभूमि तथा गोपीचन्दन की महिमा द्वारका की मिट्टी के स्पर्श से एक महान पापी का उद्धार श्रीनारदजी कहते हैं- राजन ! उस पर्वत पर पूर्वकाल में राजा रैवत ने यज्ञतीर्थ का निर्माण किया, जहाँ एक यज्ञ करके मनुष्य कोटियज्ञों का फल पाता है वहीं ‘कपिटंक’ नामक तीर्थ है, जो एक कपि के मार गिराये जाने से प्रकट हुआ था। राजन् ! रैवतक गिरि पर वह तीर्थ सब पापों का नाश करने वाला है। भौमासुर का सखा एक द्विविद नामक वानर था, जो बड़ा ही दुष्ट था। उसे बलरामजी ने वज्र के समान चोट करने वाले मुक्के से जहाँ मारा था, वही स्थान ‘कपिटंक तीर्थ’ है। वही वानर सत्पुरुषों की अवहेलना करने वाला था, तो भी वहाँ मारे जाने से तत्काल मुक्त हो गया। नरेश्वर ! उस तीर्थ में स्नान करने के लिये सदा देवता लोग आया करते हैं। ‘कलविंग तीर्थ’ की यात्रा करने पर कोटि गोदान का फल प्राप्त होता है। इससे दूना पुण्य शुभ दण्डकारण्य की यात्रा करने पर मिलता है। उससे भी चौगुना पुण्य सैन्धव नामक विशाल वन की यात्रा करने पर सुलभ होता है। अपेक्षा पांच गुन...