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09. श्रीविज्ञान खण्‍ड || अध्याय 05 || भक्ति की महिमा का वर्णन

09. श्रीविज्ञान खण्‍ड || अध्याय 05 || भक्ति की महिमा का वर्णन श्रीव्‍यासजी ने कहा- राजन ! वत्‍सासुर, अघासुर, धेनुकासुर, वकासुर, पूतना, केशी, काल-यवन, अरिष्‍टासुर, प्रल्‍म्‍बासुर, द्विविद नामक बंदर, बल्‍वल, शंख और शाल्‍व-इन सभी ने जब प्रकृति और पुरुषों से परे प्रभु को प्राप्‍त कर लिया, तब फिर भक्ति भाव रखने वाले उन्‍हें प्राप्‍त कर लें, इसमें कहना ही क्‍या है। राजन् ! पूर्वकाल की बात है- अत्‍यन्‍त बलशाली मधु और कैटभ नाम के दानव, इस प्रकार हिरण्‍याक्ष और हिरण्‍यकशिपु तथा रावण और कुम्‍भकर्ण भी भगवान विष्‍णु के साथ वैर ठानकर उनके परम पद को प्राप्‍त हो गये। फिर जो सदा सत्‍संग से प्रेम करते थे तथा अत्‍यन्‍त आदरणीय भगवान के शोभायुक्त चरण कमलों के मकरन्‍द एवं पराग में जिनका मन लुभाया रहता था- ऐसे प्रहलाद, बाणासुर, राजाबलि, शंखचूड़ एवं विभीषण आदि किस किसने भगवान विष्‍णु के धाम को नहीं प्राप्‍त किया देवर्षि नारद, बृहस्‍पति, वसिष्‍ठ, पराशर आदि तथा सांख्‍यायन, आसित, शुकदेव एवं सनक प्रभृति चरण-कमलों के मकरन्‍द के प्रधान भ्रमर कहे जाते हैं- भूमण्‍डल में बिना ही स्‍वार्थ के भ्रमण करते रहते हैं। यति, ...