Posts

Showing posts with the label 10. अश्‍वमेध खण्‍ड || अध्याय 08 || यज्ञ के योग्‍य श्‍यामकर्ण अश्‍व अवलोकन

10. अश्‍वमेध खण्‍ड || अध्याय 08 || यज्ञ के योग्‍य श्‍यामकर्ण अश्‍व का अवलोकन

10. अश्‍वमेध खण्‍ड || अध्याय 08 || यज्ञ के योग्‍य श्‍यामकर्ण अश्‍व का अवलोकन श्रीगर्गजी कहते हैं- देवर्षि‍ नारदजी का सुस्‍पष्‍ट अक्षरों से युक्‍त यह वचन सुनकर उग्रसेन चकि‍त हो गये। उन्‍होंने हँसते हुए-से उनसे कहा। राजा बोले- मुने ! मैं अश्‍वमेध यज्ञ करूंगा। आप इस यज्ञ के योग्‍य अश्‍व को मेरी अश्‍वशाला में जाकर देखि‍ये। बहुत-से अश्‍वों के बीच में से उसको छांट ली‍जि‍ये। राजा की यह बात सुनकर ‘बहुत-अच्‍छा’ कहकर देवर्षि‍ नारद यज्ञ के योग्‍य अश्‍व को देखने के लि‍ए भगवान श्रीकृष्‍ण के साथ अश्‍वशाला में गये। वहाँ जाकर उन्‍होंने धूम्रवर्ण, श्‍यामवर्ण, कृष्‍णवर्ण और पद्मवर्ण के बहुत-से मनोहर अश्‍व देखे। फि‍र वहाँ से दूसरी अश्‍वशाला में गये। वहाँ दूध, जल, हल्‍दी, केसर तथा पलाश के फूलकी-सी कान्‍ति‍वाले बहुत-से अश्‍व दृष्‍टि‍गोचर हुए। कई घोड़े चि‍तकबरे रंग के थे। कि‍तनों के अंग स्‍फटि‍तशि‍ला के समान स्‍वच्‍छ थे। वे सभी मन के समान वेगशाली थे। कि‍तने ही अश्‍व हरे और तांबे के समान वर्ण वाले थे। कुछ घोड़ों के रंग कुसुम्‍भ- जैसे और कुछ के तोते के पांख जैसे थे। कोई इन्‍द्रगोप के समान लाल थे, कोई गौरवर्ण...