10. अश्वमेध खण्ड || अध्याय 45 || गोपांगनाओं द्वारा श्रीकृष्ण की स्तुति करते हुए उनका आह्वान और श्रीकृष्ण का उनके बीच में आविर्भाव
10. अश्वमेध खण्ड || अध्याय 45 || गोपांगनाओं द्वारा श्रीकृष्ण की स्तुति करते हुए उनका आह्वान और श्रीकृष्ण का उनके बीच में आविर्भाव गोपियाँ बोलीं– जो अपने अधर बिम्ब की लालिमा से मूंगे को लज्जित करते हैं और मधुर मुरलीनाद से विनोद मानते आनंद पाते हैं, जिनका मुखारविंद नीलकमल के समान कोमल तथा श्याम है, उन गोपकुमार श्यामसुंदर की हम उपासना करती हैं। जिनकी अंगकान्ति सांवली है, जो वन विहार के रसिक हैं, जिनका अंग–अंग कोमल है, जिनके नेत्र प्रफुल्ल कमलदल के समान सुंदर एवं विशाल हैं, जो भक्त जनों की अभीष्ट कामना पूर्ण कर देते हैं, व्रज सुंदरियों के नेत्रों को शीतल करने वाले हैं, उन मनमोहन श्रीकृष्ण का हम भजन करती हैं। जिनके लोचनांचल विशेष चंचल हैं और कोमल अधर अर्धविकसित कमल की शोभा धारण करते हैं, जिनके हाथों की अंगुलियाँ और मुख बांसुरी से सुशोभित हैं, उन वेणुवादन रसिक माधव का हम चिंतन करती हैं। जिनके दाँत किंचित अंकुरित हुई कुन्दकलिका के समान उज्ज्वल हैं, जो व्रजभूमि के भूषण हैं, अखिल भुवन के लिए मंगलमयी शोभा से संपन्न हैं, जो अपने शब्द और सौरभ से मन को हर लेता है, श्रीहरि के उस सुंदर वेष को हम ग...