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08. बलभद्र खण्‍ड‎ || अध्याय 03 || ज्‍योतिष्‍मती का उपाख्‍यान

08. बलभद्र खण्‍ड‎ || अध्याय 03 || ज्‍योतिष्‍मती का उपाख्‍यान प्राडविपाक मुनि ने कहा- तदनन्‍तर करोड़ों शारदीय चन्‍द्रमाओं की कान्ति वाली स्‍वयं नाग लक्ष्‍मी महान रथ पर सवार होकर वहाँ पधारीं। करोड़ों सखियां उनकी शोभा बढ़ा रही थीं। उन्‍होंने आकर स्‍वामी महान अनन्‍त भगवान संकर्षण से कहा- भगवान् ! मैं भी आपके साथ ही भूमण्‍डल पर चलूँगी। आपके वियोग की व्‍यथा मुझे इतना व्‍याकुल कर देगी कि मैं अपने प्राणों को नहीं रख सकूँगी। नाग लक्ष्‍मी का गला भर आया था। भगवान अनन्‍त ने जो समस्‍त जगत के कारणों के भी कारण हैं, भक्तों का दु:ख निवारण करना ही जिनका स्‍वभाव है और जिनका श्री विग्रह ऐरावत के समान बृहत सर्परूप है। अपनी प्रिया की यह दशा देखकर कहा- हे रमभोरु ! तुम शोक मत करो। पृथ्‍वी पर जाकर रेवती की देह में विलीन हो जाओ। फिर मेरी सेवा में उपस्थित हो जाओगी। यह सुनकर नाग लक्ष्‍मी बोलीं- ‘रेवती की देह में विलीन हो जाओ। फिर मेरी सेवा में उपस्थित हो जाओगी। यह सुनकर नाग लक्ष्‍मी बोलीं- ‘रेवती की देह में विलीन हो जाओ। फिर मेरी सेवा में उपस्थित हो जाओगी। यह सुनकर नागलक्ष्‍मी बोलीं- ‘रेवती कौन हैं, किनकी कन्‍य...