05. मथुराखण्ड || अध्याय 18 || गोपियों के उद्गार तथा उनसे विदा लेकर उद्धव का मथुरा को लौटना
गर्ग संहिता मथुराखण्ड : अध्याय 18 गोपियों के उद्गार तथा उनसे विदा लेकर उद्धव का मथुरा को लौटना बर्हिष्मतीपुरी की गोपियों ने कहा– अहो ! प्रलय के समुद्र में वाराहरूपधारी महात्मा श्रीहरि ने कृपापूर्वक जिसका उद्धार किया था, उसी पृथ्वी को मारने के लिये आदिराज पृथु के रूप में वे उससे पीछे दौडे़। दयालु होकर भी वे निर्दयता के लिये उद्यत हो गये (अत: कभी कठोर होना और कभी कृपा करना इन श्रीहरि का स्वभाव ही है) ? लतारूपा गोपियाँ बोलीं- विश्व के वैद्य महात्मा धन्वन्तरि पूर्वकालमें अमृत-कलश के साथ समुद्र से प्रकट हुए, किंतु उन्होंने वह अमृत अपने हाथ से नहीं बाँटा, परंतु जब उसके लिये देवता और असुर आपस में वैर बाँधकर युद्ध के लिये उद्यत हो गये, तब कलहप्रिय श्रीहरि ने स्वयं मोहिनी नारी का रूप धारण करके वह सुधा केवल देवताओं को पिला दी नागेन्द्र कन्यारूपा गोपियों ने कहा - दण्डक नामक महावन में इन श्रीहरि को श्रीरामरूप में देखकर शूर्पणखा इन्हें अपना पति बनाने की इच्छा से इनके पास आयी थी, किंतु लक्ष्मण सहित इन्होंने उस बेचारी के नाक-कान काटकर कुरूप बना दिया। यह कैसी निष्ठुर...