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04. माधुर्य खण्‍ड || अध्याय 14 || कौरव-सेना से पीड़ित रंगोजि गोप का कंस की सहायता से व्रजमण्‍डल की सीमा पर निवास तथा उसकी पुत्री रूप में जालंधरी गोपियों का प्राकट्य।

श्री गर्ग संहिता 04. माधुर्य खण्‍ड || अध्याय 14 || कौरव-सेना से पीड़ित रंगोजि गोप का कंस की सहायता से व्रजमण्‍डल की सीमा पर निवास तथा उसकी पुत्री रूप में जालंधरी गोपियों का प्राकट्य। श्रीनारदजी कहते हैं:- मिथिलेश्वर, अब जालंधर के अन्‍त:पुर की स्त्रियों के गोपीरूप में जन्‍म लेने का वर्णन सुनो।  महाराज, साथ ही उनके कर्मों को भी सुनो, जो सदा ही मनुष्‍यों के पापों का नाश करने वाले हैं।  राजन्, सप्‍तनदी के किनारे 'रंगपत्तन' नाम से प्रसिद्ध एक उत्तम नगर था, जो सब प्रकार की सम्‍पदाओं से प्रसन्‍न तथा विशाल था, वह दो योजन विस्‍तृत गोलकार नगर था। उस नगर का मालिक या पुरधीश रंगोजिनामक एक गोप था, जो महान बलवान था, वह पुत्र-पौत्र आदि से संयुक्‍त तथा धन-धान्‍य से समृद्धिशाली था।  हस्तिनापुर के स्‍वामी राजा धृतराष्‍ट्र को वह सदा एक करोड़ स्‍वर्ण मुद्राएँ वार्षिक कर के रूप में दिया करता था। मिथिलेश्वर, एक समय वर्ष बीत जाने पर भी धन के मद से उन्‍मत्त गोप ने राजा को वार्षिक कर नहीं दिया, इतना ही नहीं, वह गोपनायक रंगोजि मिलने तक नहीं गया।  तब धृतराष्‍ट्र के भेजे हुए दस हजार वीर जाकर उस...