07. विश्वजित खण्ड || अध्याय 30 || रम्यक वर्ष में कलंक राक्षस पर विजय; नै:श्रेयसवन, मानवी नगरी तथा मानव गिरि का दर्शन; श्राद्धदेव मनु द्वारा प्रद्युम्न की स्तुति
07. विश्वजित खण्ड : अध्याय 30 रम्यक वर्ष में कलंक राक्षस पर विजय; नै:श्रेयसवन, मानवी नगरी तथा मानव गिरि का दर्शन; श्राद्धदेव मनु द्वारा प्रद्युम्न की स्तुति श्री नारदजी कहते हैं- राजन ! इस प्रकार हिरण्मयखण्ड पर विजय पाकर महाबली प्रद्युम्न देवलोक की भाँति प्रकाशित होने वाले रम्यक वर्ष में गये। उसका सीमा-पर्वत साक्षात गिरिराज ‘नील’ है। उसके उत्तरवर्ती काले देश में भयंकर नाद से परिपूर्ण ‘भीमनादिनी’ नाम की नगरी है। वहाँ कालनेमि का पुत्र कलंक नाम का राक्षस रहता था, जो त्रेतायुग में श्रीरामचन्द्रजी से डरकर युद्ध भूमि से भाग आया था। वह लंकापुरी से यहाँ आकर राक्षसों के साथ निवास करता था। उसने दस हजार राक्षसों के साथ यादवों से युद्ध करने का निश्चय किया। काले रंग का वह राक्षसराज गधे पर आरुढ़ हो यादव सेना के सामने आया। गर्ग संहिता पृ. 540 यादवों और राक्षसों में घोर युद्ध होने लगा। प्रघोष, गात्रवान्, सिंह, बल, प्रबल, ऊर्ध्वग, सह, ओज, महाशक्ति तथा अपराजित-लक्ष्मणा के गर्भ से उत्पन्न हुए श्रीकृष्ण के ये दस कल्याण स्वरूप पुत्र तीखे और चमकील...