11. गर्ग संहिता-माहात्म्य || अध्याय 01 || गर्ग संहिता के प्राकट्य का उपक्रम
11. गर्ग संहिता-माहात्म्य || अध्याय 01 || गर्ग संहिता के प्राकट्य का उपक्रम जो श्रीकृष्ण को ही देवता (आराध्य) मानने वाले वृष्णिवंशियों के आचार्य तथा कवियों में सर्वश्रेष्ठ हैं, उन महात्मा श्रीमान गर्गजी को नित्य बारंबार नमस्कार है। शौनक जी बोले- ब्रह्मन् ! मैंने मुख से पुराणों का उत्तम-से-उत्तम माहात्म्य विस्तारपूर्वक सुना है, वह श्रोत्रेन्दिय के सुख की वृद्धि करने वाला है। अब गर्ग मुनि की संहिता का जो सार रूप माहात्म्य है, उसका प्रयत्नपूर्वक विचार करके मुझसे वर्णन कीजिये। अहो! जिसमें श्रीराधा-माधव की महिमा का विविध प्रकार से वर्णन किया गया है, वह गर्ग मुनि की भगवल्लीला-सम्बन्धिनी संहिता धन्य है। सूतजी कहते हैं- अहो शौनक ! इस माहात्म्य को मैंने नारद जी से सुना है। इसे सम्मोहन-तन्त्र में शिवजी ने पार्वती से वर्णन किया था। कैलास पर्वत के निर्मल शिखर पर, जहाँ अलकनन्दा के तट पर अक्षय वट विद्यमान है,उसकी छाया में शंकरजी नित्य विराजते हैं। एक समय की बात है, सम्पूर्ण मंगलों की अधिष्ठात्री देवी गिरिजा ने प्रसन्नतापूर्वक भगवान शंकर से अपनी मनभावी बात पू...