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07. विश्वजित खण्‍ड || अध्याय 37 || श्रीकृष्‍ण-पुत्र भानु के हाथ से हरिश्‍मश्रु दैत्‍य का वध

07. विश्वजित खण्‍ड || अध्याय 37 || श्रीकृष्‍ण-पुत्र भानु के हाथ से हरिश्‍मश्रु दैत्‍य का वध नारदजी कहते हैं- राजन् ! महानाभ मारा गया, यह सुनकर तथा दैत्‍य सेना पलायन कर गयी यह देखकर, मगरमच्‍छ पर चढ़ा हुआ दैत्‍य हरिश्मश्रु समरभूमि में आया। उस समय हरिश्मश्रु दैत्‍य के ओठ फड़क रहे थे, उसने यादवों के सुनते हुए अत्‍यन्‍त कठोर वचन कहा । हरिश्मश्रु बोला- अरे ! तुम सब लोग मेरे शक्ति के सामने क्‍या हो स्‍वल्‍प–पराक्रमी मनुष्‍य ही तो हो। दीनहीन होने पर केवल अस्‍त्र शस्‍त्रों के बल पर जीतते हो। तुम जैसे लोगों में पुरुषार्थ ही क्‍या है यदि तुम्‍हारे दल में कोई भी बलवान हो तो मेरे साथ बिना अस्‍त्र-शस्‍त्र के मल्ल युद्ध करे, जिससे तुम्‍हारे पौरुष का पता लगे। नारद जी कहते हैं- दैत्‍य की ऐसी बात सुनकर और उसके अत्‍यन्‍त उद्भट शरीर को देखकर सब लोग परस्‍पर उसकी प्रशंसा करते हुए मौन रह गये-उसे कोई उत्तर न दे सके। तब सत्‍यभामा के बलवान पुत्र भानु मन ही मन भगवान श्रीकृष्‍ण का स्‍मरण करते हुए रणभूमि में अस्‍त्र शस्‍त्र त्‍यागकर सहसा उसके सामने खड़े हो गये। राजन् ! महाबली हरिश्मश्रु तिमिंगिल (मगरमच्‍छ) की पी...