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09. श्रीविज्ञान खण्‍ड || अध्याय 02 || व्‍यास जी के द्वारा गतियों का निरूपण

09. श्रीविज्ञान खण्‍ड || अध्याय 02 ||  व्‍यास जी के द्वारा गतियों का निरूपण राजा उग्रसेन बोले- आपके द्वारा किये गये वर्णन को सुनकर मैं कृतकृत्‍य हो गया तथा आनन्‍द से भर गया हूँ। आपने मेरे ऊपर बड़ी कृपा की। मेरे मन में उठे हुए संदेह को दूर करने में आप ही समर्थ हैं। ब्रह्मन् ! सकाम कर्मों की क्‍या गति होती है, उनका क्‍या लक्षण है और उनके कितने भेद हैं इसे तत्‍वत: कहने की कृपा कीजिये। व्‍यासजी ने कहा- राजन् ! गुणों के साथ सम्‍बन्‍ध से सभी कर्म सकाम हो जाते हैं, वे ही फल का त्‍याग कर देने पर निष्‍काम हो जाते हैं। यदुराज ! जो सकाम कर्म है, उसे बन्‍धन समझो। जो निष्‍काम कर्म होता है, वह मोक्ष देने वाला है। अतएव वह परम मंगलमय होता है। सत्‍व, रज और तम- इन तीन गुणों की उत्‍पत्ति प्रकृति से होती है। जैसे भगवान विष्‍णु से सारे पदार्थ व्‍याप्‍त हैं, उसी प्रकार गुणों से सम्‍पूर्ण विश्व ओतप्रोत है। सत्त्वगुण की स्थिति में जिनके प्राण निकलते हैं, वे स्‍वर्गलोक में जाते हैं, रजोगुण में प्रयाण करने वाले नरलोक के अधिकारी होते हैं तथा तमोगुण की अधिकता में मरने वाले को नरक की यातना भोगनी पड़ती है। जो ...