10. अश्वमेध खण्ड || अध्याय 55 || व्याजी का मुनि-दम्पति तथा राज दम्पतियों को गोमती का जल लाने के लिए आदेश देना, नारदजी का मोह और भगवान द्वारा उस मोह का भंजन, श्रीकृष्ण की कृपा से रानियों का कलश में जल भरकर लाना
10. अश्वमेध खण्ड || अध्याय 55 || व्याजी का मुनि-दम्पति तथा राज दम्पतियों को गोमती का जल लाने के लिए आदेश देना, नारदजी का मोह और भगवान द्वारा उस मोह का भंजन, श्रीकृष्ण की कृपा से रानियों का कलश में जल भरकर लाना श्रीगर्गजी कहते हैं- राजन ! तत्पश्चात आठ द्वारों से युक्त, फहराती हुई पताकाओं से सुशोभित, अग्निकुण्डों से सम्पन्न और आठ याज्ञिकों से युक्त रमणीय यज्ञमंडल में, जहाँ पलाश, बेल, तथा बहुवार के यूप शोभा दे रहे थे, अनेकानेक वेदिकाओं तथा चषालों (यज्ञसतम्भों ऊपर लगे हुए काष्ठमय वलयों) से जो विभूषित था तथा जिसमें स्त्रुवा, मृगचर्म, कुश, मूसल और उलूखल आदि वस्तुएँ संकलित थीं और इसने अतिरिक्त भी जहाँ बहुत-सी सामग्रियों और नाना प्रकार की वस्तुओं का संग्रह किया गया था, राजर्षि उग्रसेन वेदों के पारंगत महर्षियों तथा यादवों के साथ वैसी ही शोभा पा रहे थे, जैसे अमरावतीपुरी में देवराज इन्द्र देवताओं के साथ सुशोभित होते हैं। भगवान श्रीकृष्णचंन्द्र के आमंत्रण पर नन्द आदि गोप, वृषभानुवर आदि श्रेष्ठ पुरुष तथा श्रीदामा आदि ग्वाल-बाल द्वारकापुरी में आये। यशोदा, राधिका तथा अन्य सब व्...