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08. बलभद्र खण्‍ड‎ || अध्याय 05 || श्रीबलराम और श्रीकृष्‍ण का प्राकट्य

08. बलभद्र खण्‍ड‎ || अध्याय 05 || श्रीबलराम और श्रीकृष्‍ण का प्राकट्य दुर्योधन ने कहा- मुनिराज ! पूर्वजन्‍म में मैं भगवान संकर्षण का भक्त था, अत: मैं धन्‍य हूँ। आपने मुझे यह स्‍मरण करा दिया। साथ ही भगवान वासुदेव की प्रभावयुक्त परम महिमा भी आपने सुनायी। अब यह बतलाने की कृपा कीजिये कि भगवान बलराम और श्रीकृष्‍णचन्‍द्र ने पृथ्‍वी पर अवतीर्ण होकर अपने पिता की नगरी मथुरा से व्रज में कैसे गमन किया और व्रज वासियों से वे गुप्‍त रूप में किस प्रकार रहे। प्राडविपाक मुनि बोले- यादवों की पुरी मथुरा में राजा उग्रसेन थे। एक समय उनके बड़े भाई देवक की कन्‍या देवकी से वसुदेव जी का विवाह हुआ। विवाह के उपरान्‍त वर-वधू की विदाई के समय उग्रसेन नन्‍दन कंस स्‍वयं वसुदेव देवकी का रथ चलाने लगा। उसी समय आकाशवाणी हुई- ‘अरे निर्बोध ! तू जिसका रथ चला रहा है, उसी का आठवाँ गर्भ तेरा विनाश करेगा। यह सुनते ही कालनेमि-तनय महान दैत्‍य कंस हाथ में तलवार लेकर बहिन देवकी का वध करने को तैयार हो गया। उसी क्षण वसुदेवजी ने कंस को समझाकर कहा कि ‘तुम इसका वध मत करो। जिनसे तुमको और मुझको भी भय हो रहा है, देवकी के गर्भ से उत्‍पन्न...