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07. विश्वजित खण्‍ड || अध्याय 28 || उत्तर कुरु वर्ष पर यादवों की विजय; वाराहीपुरी में राजा गुणाकर द्वारा प्रद्युम्न का समादर

07. विश्वजित खण्‍ड || अध्याय 28 ||  उत्तर कुरु वर्ष पर यादवों की विजय; वाराहीपुरी में राजा गुणाकर द्वारा प्रद्युम्न का समादर श्रीनारद जी कहते हैं-  राजन् ! इसके बाद महाबाहु प्रद्युम्न सुमेरु के उत्तरवर्ती और श्रृंगवान पर्वत के पास बसे हुए विचित्र समृद्धिशाली ‘उत्तर कुरु’ नामक देश में गये। वहाँ ‘भद्रा’ नाम की गंगा में स्‍नान करके वे वाराही नगरी में जा पहूंचे, जहाँ कुरु वर्ष के अधिपति चक्रवर्ती सम्राट गुणाकर राज्‍य करते थे। राजा गुणा करने बड़ी भारी सामग्री का संचय करके देवर्षि गणों से घिरे रहकर दसवें अश्व मेध यज्ञ का अनुष्‍ठान आरम्‍भ किया था। उन्‍होंने एक मनोहर श्रेतवर्ण श्‍याम कर्ण अश्व छोड़ा था और उनके पुत्र वीर धन्‍वा उस अश्व की रक्षा के लिये निकले थे। प्रचण्‍ड-पराक्रमी महावीर वीर धन्‍वा उस घोड़े की देख-भाल करते हुए दस अक्षौहिणी सेना के साथ विचर रहे थे। वीर, चन्‍द्र, सेन, चित्रगु, वेगवान, आम, शकु्ड वसु, श्रीमान और कुन्ति-नाग्रजिती के इन दस पुत्रों ने सब ओर से शुभ्र घोड़े को घेरकर पकड़ लिया और हर्ष से भरे हुए वे ‘यह किसका छोड़ा हुआ घोड़ा है- यों कहते हुए प्रद्यु...