09. श्रीविज्ञान खण्ड || अध्याय 03 || सकाम एवं निष्काम भक्ति योग का वर्णन
09. श्रीविज्ञान खण्ड || अध्याय 03 || सकाम एवं निष्काम भक्ति योग का वर्णन राजा उग्रसेन ने कहा- ब्रह्मन् ! गुण और कर्म की गति आपके श्री मुख से मैं सुन चुका। सभी लोक आवागमन से युक्त हैं, यह भी भली-भाँति निश्चित हो गया। निष्काम भाव से साक्षात श्रीहरि का सेवन करने पर भक्तों को वह उत्तम धाम, जो दिव्य एवं दूसरों के लिये दुर्लभ है, मिलता है- अब मुझे यह बताइये कि भक्तियोग, जिसके प्रभाव से भक्तवत्सल भगवान प्रसन्न हो जाते हैं, कितने प्रकार का है। श्रीव्यासजी बोले- द्वारकानरेश ! तुम धन्य हो ! तुम श्रीहरि के प्रेमी हो तथा भगवान श्रीकृष्ण तुम्हारे इष्टदेव हैं। तुमने भक्ति योग के सम्बन्ध में प्रश्न किया हैं, इससे तुम्हारी वह निर्मल बुद्धि भी धन्य है। यादव ! जिसे सुनकर संसार का संहार करने वाला घोर पापी भी शुद्ध हो जाता है, उस भक्ति योग का वर्णन विस्तारपूर्वक तुम्हें सुनाता हूँ। राजन् ! सगुण और अनेक भेद हैं और निर्गुण का एक ही लक्षण है। देह धारियों के गुणानुसार सगुण भक्ति के विभिन्न प्रकार होते हैं। उन गुणों से युक्त तीन तरह के भक्त होते हैं। उनका वर्णन अलग-अलग सुनो। जो भेद-दृष्टि रखन...