10. अश्वमेध खण्ड || अध्याय 41 || श्रीराधा और श्रीकृष्ण का मिलन
10. अश्वमेध खण्ड || अध्याय 41 || श्रीराधा और श्रीकृष्ण का मिलन श्रीगर्गजी कहते हैं– राजन् ! संध्या के समय श्रीराधा ने नन्दनंदन श्रीकृष्ण को बुलवाया। उनका आमंत्रण पाकर नित्य एकांत स्थल में, जहाँ शीतल कदली वन था, श्रीकृष्ण वहाँ गए। कदलीवन में एक मेघ– महल बना था, जिसमें चंदन पंक का छिड़काव हुआ था। केले के पत्तों से सज्जित होने के कारण वह भवन बड़ा मनोहर लगता था। अपनी विशालता से सुशोभित उस मेघभवन में यमुना जल का स्पर्श करके बहती हुई वायु पानी के फुहारे बिखेरती रहती थी। श्रीराधिका का ऐसा सुंदर सारा मेघ मंदिर उनके विरह–दु:ख की आग से सदा भस्मीभूत हुआ–सा प्रतीत होता था। नरेश्वर ! गोलोक में प्राप्त हुए श्रीदामा के शाप से वृषभानु नंदिनी को श्रीकृष्ण विरह का दु:ख भोगना पड़ रहा था। उस दशा में भी वे वहाँ अपने शरीर की रक्षा इसलिए कर रही थीं कि किसी न किसी दिन श्रीकृष्ण यहाँ आएंगे । सखी मुख से जब यह संवाद मिला कि श्रीकृष्ण अपने विपिन में पधारे हैं, तब श्रीवृषभानु नंदिनी उन्हें लाने के लिए अपने श्रेष्ठ आसन से तत्काल उठकर खड़ी हो गईं और सहेलियों के साथ दरवाजे पर आईं। व्रजेश्वरी श्यामा ने व्...