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Showing posts from May, 2022

10. अश्‍वमेध खण्‍ड || अध्याय 59A || गर्गाचार्य के द्वारा राजा उग्रसेन के प्रति भगवान श्रीकृष्‍ण के सहस्रनामों का वर्णन (1 से 250 तक)

10. अश्‍वमेध खण्‍ड || अध्याय 59A || गर्गाचार्य के द्वारा राजा उग्रसेन के प्रति भगवान श्रीकृष्‍ण के सहस्रनामों का वर्णन (1 से 250 तक) श्रीगर्गजी कहते हैं-  राजन ! तब राजा उग्रसेन ने पुत्र की आशा छोड़कर सम्पूर्ण विश्‍व को मन का संकल्प मात्र जानकर व्‍यासजी से अपना संदेह पूछा- ‘ब्रह्मन ! किस प्रकार से लौकिक सुख का परित्याग करके मनुष्‍य परब्रह्म परमात्मा श्रीकृष्‍ण का भजन करे, यह मुझे विश्‍वासपूर्वक बताने की कृपा करें। व्‍यासजी बोले-  महाराज उग्रसेन ! मैं तुम्हारे सामने सत्य और हितकर बात कह रहा हूँ, इसे एकाग्रचित्त होकर सुनो। राजेन्‍द्र ! तुम श्रीराधा और श्रीकृष्‍ण की उत्कृष्‍ट आराधना करो। इन दोनों के पृथक-पृथक सहस्‍त्र भाव से भजन करो। भूपते ! राधा के सहस्र नाम को ब्रह्मा, शंकर, नारद और कोई-कोई मेरे- जैसे- लोग भी जानते हैं। उग्रसेन ने कहा-  ब्रह्मन ! मैंने पूर्वकाल में सूर्यग्रहण के अवसर पर कुरुक्षेत्र के एकान्त दिव्य शिविर में नारदजी के मुख से ‘राधिकासहस्रनाम’ का श्रवण किया था, परंतु अनायास ही महान कर्म करने वाले भगवान श्रीकृष्‍ण के सहस्‍त्र नाम को मैंने नहीं सुना है। अत: कृप...

21.00 ॥ श्रीकृष्णसहस्रनामावलिः ॥

॥ श्रीकृष्णसहस्रनामावलिः ॥ ॐ कृष्णाय नमः । श्रीवल्लभाय । शार्ङ्गिणे । विष्वक्सेनाय । स्वसिद्धिदाय । क्षीरोदधाम्ने । व्यूहेशाय । शेषशायिने । जगन्मयाय । भक्तिगम्याय । त्रयीमूर्तये । भारार्तवसुधास्तुताय । देवदेवाय । दयासिन्धवे । देवाय । देवशिखामणये । सुखभावाय । सुखाधाराय । मुकुन्दाय । मुदिताशयाय नमः ॥ २० ॐ अविक्रियाय नमः । क्रियामूर्तये । अध्यात्मस्वस्वरूपवते । शिष्टाभिलक्ष्याय । भूतात्मने । धर्मत्राणार्थचेष्टिताय । अन्तर्यामिणे । कालरूपाय । कालावयवसाक्षिकाय । वसुधायासहरणाय । नारदप्रेरणोन्मुखाय । प्रभूष्णवे । नारदोद्गीताय । लोकरक्षापरायणाय । रौहिणेयकृतानन्दाय । योगज्ञाननियोजकाय । महागुहान्तर्निक्षिप्ताय । पुराणवपुषे । आत्मवते । शूरवंशैकधिये नमः ॥ ४० ॐ शौरये नमः । कंसशङ्काविषादकृते । वसुदेवोल्लसच्छक्तये । देवक्यष्टमगर्भगाय । वसुदेवस्तुताय । श्रीमते । देवकीनन्दनाय । हरये । आश्चर्यबालाय । श्रीवत्सलक्ष्मवक्षसे । चतुर्भुजाय । स्वभावोत्कृष्टसद्भावाय । कृष्णाष्टम्यन्तसम्भवाय । प्राजापत्यर्क्षसम्भूताय । निशीथसमयोदिताय । शङ्खचक्रगदा पद्मपाणये । पद्मनिभेक्षणाय । किरीटिने । कौस्तुभोरस्काय । स्फुरन्म...

10. अश्‍वमेध खण्‍ड || अध्याय 58 || श्रीकृष्‍ण द्वारा कंस आदि का आवाहन और उनका श्रीकृष्‍ण को ही परमपिता बताकर इस लोक के माता-पिता से मिले बिना ही वैकुण्‍ठलोक को प्रस्‍थान

10. अश्‍वमेध खण्‍ड || अध्याय 58 || श्रीकृष्‍ण द्वारा कंस आदि का आवाहन और उनका श्रीकृष्‍ण को ही परमपिता बताकर इस लोक के माता-पिता से मिले बिना ही वैकुण्‍ठलोक को प्रस्‍थान श्रीगर्गजी कहते हैं- राजन ! इसके बाद महात्‍मा श्रीकृष्‍ण के आवाहन करने पर कंस आदि नौ भाई सब के सब वैकुण्‍ठ से शीघ्र ही वहाँ आ गये। उनको आया देख वहाँ सब लोगों को बड़ा विस्‍मय हुआ। द्वारका में पहुँचकर उन कंस आदि सब भाइयों ने बारी-बारी से श्रीकृष्‍ण, बलराम, प्रद्युम्न और अनिरुद्ध को प्रणाम किया। नरेश्‍वर ! सुधर्मा सभा में इन्‍द्र क सिंहासन पर रानी रुचिमती के साथ बैठे हुए महाराज उग्रसेन ने अपने कंस आदि पुत्रों को श्रीकृष्‍ण स्‍वरुप एवं चार भुजाधारी देखा। देखकर उन्‍हें बड़ी प्रसन्नता हुई। वे शंख, चक्र, गदा और पद्म से विभूषित थे तथा पीताम्‍बर धारण किये श्रीकृष्‍ण के पास खडे़ थे। राजा ने अपने उन पुत्रों को भी निकट बुलाया। तब भगवान श्रीकृष्‍ण ने मन्‍द मुस्‍कान के साथ कंस आदि से कहा- ‘देखो, वे दोनों तुम्हारे माता-पिता हैं और तुम्हें देखने के लिए उत्सुक हैं। वीरों ! तुम उनके निकट जाकर भक्तिभाव से नमन करो’। भगवान श्रीकृष्‍ण का यह...

10. अश्‍वमेध खण्‍ड || अध्याय 57 || ब्राह्मण भोजन, दक्षिणा-दान; पुरस्‍कार-वितरण; संबंधियों का सम्मान तथा देवता आदि सबका अपने अपने निवास स्‍‍थान को प्रस्‍थान

10. अश्‍वमेध खण्‍ड || अध्याय 57 || ब्राह्मण भोजन, दक्षिणा-दान; पुरस्‍कार-वितरण; संबंधियों का सम्मान तथा देवता आदि सबका अपने अपने निवास स्‍‍थान को प्रस्‍थान श्रीगर्गजी कहते हैं - राजन ! तदन्‍तर श्रीकृष्‍ण और भीमसेन के साथ यादवराज उग्रसेन ने ब्राह्मणों और राजाओं से प्रार्थना करके उन्‍हें भाँति-भाँति के पदार्थ भोजन कराये। उन्‍होंने ब्राह्मणों को निमंत्रित करके उत्तम शष्‍कुली (पूड़ी), खीर, भात, अच्‍छी दाल और कढ़ी, हलुवा, मालपूआ त‍था सुन्‍दर फेणिका आदि विशेष अन्न परोसकर भलीभाँति भोजन कराया। शिखरिणी (सिखरन), घृतपूर (घेवर) सुशक्तिका (अच्‍छी-अच्‍छी साग-सब्‍जी), सुपटिनी (चटनी आदि), दधिकूप (दहीबड़ा) लप्‍सी तथा गोल, सुन्‍दर और चन्‍द्रमा के समान उज्ज्वल सोहारी आदि को बड़े, लड्डू और पापड़ के साथ परोसा। उन ब्राह्मणों में से कुछ तो फलाहारी थे, कुछ सूखे पत्ते खाने वाले थे, कोई केवल जल पीकर रहने वाले और कोई दुर्बा के रस का आस्‍वादन करने वाले (दुर्वासा) थे। कोई हवा पीकर रहने वाले जन्‍मकाल से ही तपस्‍वी थे। कितने तो भोजनों (भोज्य पदार्थों) के नाम तक नहीं जानते थे। जब उनके सामने भाँति-भाँति के भोजन परोसे ...

10. अश्‍वमेध खण्‍ड || अध्याय 56 || राजा द्वारा यज्ञ में विभिन्रन बन्धु-बान्धवों को भिन्न-भिन्न कार्यों में लगना, श्रीकृष्‍ण का ब्राह्मणों के चरण पखारना, घी की आहुति से अग्निदेव को अजीर्ण होना, यज्ञपशु के तेज का श्रीकृष्‍ण में प्रवेश, उसके शरीर का कर्पूर के रूप में परिवर्तन, उसकी आहुति और यज्ञ की समाप्ति पर अवभृथ स्नान

10. अश्‍वमेध खण्‍ड || अध्याय 56 || राजा द्वारा यज्ञ में विभिन्रन बन्धु-बान्धवों को भिन्न-भिन्न कार्यों में लगना, श्रीकृष्‍ण का ब्राह्मणों के चरण पखारना, घी की आहुति से अग्निदेव को अजीर्ण होना, यज्ञपशु के तेज का श्रीकृष्‍ण में प्रवेश, उसके शरीर का कर्पूर के रूप में परिवर्तन, उसकी आहुति और यज्ञ की समाप्ति पर अवभृथ स्नान श्रीगर्गजी कहते हैं- महाराज ! महात्मा राजा उग्रसेन के यज्ञ में उनकी परिचर्या में प्रेम के बंधन से बंधे हुए समस्‍त बन्धु-बान्धव लगे रहे। उन यादवराज से विभिन्न कर्मों में सगे- संबंधी भाई-बंधुओं को लगाया। भीमसेन रसोईघर के अध्‍यक्ष बनाये गये। धर्मराज युधिष्ठिर को धर्मपालन संबंधी कर्म में नियुक्त किया गया। राजा ने सत्‍पुरुषों की सेवा शुश्रूषा में अर्जुन को, विभिन्न द्रव्‍यों को प्रस्‍तुत करने में नकुल को, पूजन कर्म में सहदेव को और धनाध्‍यक्ष के स्‍थान पर दुर्योधन को नियुक्त किया। दानकर्म में दानी कर्ण को, परोसने के कार्य में द्रौपदी को तथा रक्षा के कार्य में श्रीकृष्‍ण के अठारह महारथी पुत्रों को लगाया। तत्पश्‍चात भूपाल ने युयुधान, विकर्ण, हदीक, विदुर, अक्रूर और उद्धव को भी अन...

10. अश्‍वमेध खण्‍ड || अध्याय 55 || व्‍याजी का मुनि-दम्‍पति‍ तथा राज दम्‍पतियों को गोमती का जल लाने के लिए आदेश देना, नारदजी का मोह और भगवान द्वारा उस मोह का भंजन, श्रीकृष्‍ण की कृपा से रानियों का कलश में जल भरकर लाना

10. अश्‍वमेध खण्‍ड || अध्याय 55 || व्‍याजी का मुनि-दम्‍पति‍ तथा राज दम्‍पतियों को गोमती का जल लाने के लिए आदेश देना, नारदजी का मोह और भगवान द्वारा उस मोह का भंजन, श्रीकृष्‍ण की कृपा से रानियों का कलश में जल भरकर लाना श्रीगर्गजी कहते हैं- राजन ! तत्‍पश्‍चात आठ द्वारों से युक्त, फहराती हुई पताकाओं से सुशोभित, अग्निकुण्डों से सम्‍पन्‍न और आठ याज्ञिकों से युक्त रमणीय यज्ञमंडल में, जहाँ पलाश, बेल, तथा बहुवार के यूप शोभा दे रहे थे, अनेकानेक वेदिकाओं तथा चषालों (यज्ञसतम्‍भों ऊपर लगे हुए काष्‍ठमय वलयों) से जो विभूषित था तथा जिसमें स्‍त्रुवा, मृगचर्म, कुश, मूसल और उलूखल आदि वस्‍तुएँ संकलित थीं और इसने अतिरिक्त भी जहाँ बहुत-सी सामग्रियों और नाना प्रकार की वस्‍तुओं का संग्रह किया गया था, राजर्षि उग्रसेन वेदों के पारंगत महर्षियों तथा यादवों के साथ वैसी ही शोभा पा रहे थे, जैसे अमरावतीपुरी में देवराज इन्‍द्र देवताओं के साथ सुशोभित होते हैं। भगवान श्रीकृष्‍णचंन्‍द्र के आमंत्रण पर नन्‍द आदि गोप, वृषभानुवर आदि श्रेष्‍ठ पुरुष तथा श्रीदामा आदि ग्‍वाल-बाल द्वारकापुरी में आये। यशोदा, राधिका तथा अन्‍य सब व्...

10. अश्‍वमेध खण्‍ड || अध्याय 54 || वसुदेव आदि के द्वारा अनिरुद्ध की अगवानी, सेना और अश्व सहित यादवों का द्वारकापुरी में लौटकर सबसे मिलना तथा श्रीकृष्ण और उग्रसेन आदि के द्वारा समागत नरेशों का सत्कार

10. अश्‍वमेध खण्‍ड || अध्याय 54 || वसुदेव आदि के द्वारा अनिरुद्ध की अगवानी, सेना और अश्व सहित यादवों का द्वारकापुरी में लौटकर सबसे मिलना तथा श्रीकृष्ण और उग्रसेन आदि के द्वारा समागत नरेशों का सत्कार श्रीगर्गजी कहते हैं- नरेश्वर ! तदनंतर उग्रसेन के आदेश से वसुदेव आदि समस्त श्रेष्ठ यादव विजय यात्रा से लौटे हुए अनिरुद्ध को लाने के लिए द्वारकापुरी से निकले। वे हाथी, घोड़ों, रथों और शिविकाओं पर बैठे थे। नृपेश्वर ! उनके साथ बलदेव श्रीकृष्ण आदि प्रद्युम्न आदि तथा उद्धव आदि हाथी पर आरूढ़ हो श्याम कर्ण अश्व को देखने के लिए निकले। नृपश्रेष्ठ ! श्रीकृष्ण और बलराम की माता ने देवकी आदि नारियाँ विचित्र शिविकाओं पर बैठ कर नगर से निकलीं। भगवान श्रीकृष्ण की जो रुक्मणि और सत्यभामा आदि पटरानियाँ तथा सोलह हजार अन्य रानियाँ थीं। वे सब की सब शिविकाओं पर आरूढ़ हो उन लोगों के साथ गईं। नृपेश्वर ! बहुत सी कुमारियाँ हाथियों पर बैठकर लावा, मोती और फूलों की वर्षा करने के लिए शीघ्रतापूर्वक गईं। पनिहारिनें (पानी ढोने वाली स्त्रियाँ) जल से भरे हुए कलश लेकर निकलीं। सौभाग्यवती ब्राह्मण पत्नियां गन्ध, पुष्प, अक्षत और द...

10. अश्‍वमेध खण्‍ड || अध्याय 53 || उद्धव की सलाह से समस्त यादवों का द्वारकापुरी की ओर प्रस्थान तथा अनिरुद्ध की प्रेरणा से उद्धव का पहले द्वारकापुरी में पहुँचकर यात्रा का वृत्तांत सुनाना

10. अश्‍वमेध खण्‍ड || अध्याय 53 || उद्धव की सलाह से समस्त यादवों का द्वारकापुरी की ओर प्रस्थान तथा अनिरुद्ध की प्रेरणा से उद्धव का पहले द्वारकापुरी में पहुँचकर यात्रा का वृत्तांत सुनाना श्रीगर्गजी कहते हैं- महाराज ! राजा उग्रसेन का घोड़ा बड़े–बड़े वीर नरेशों का दर्शन करता तथा भारतवर्ष में विचरता हुआ अन्यान्य राज्यों में गया। प्रजानाथ ! इस तरह भ्रमण करते हुए उस अश्व को बहुत काल व्यतीत हो गया और फाल्गुन का महीना आ पहुँचा। जो सबको घर की याद दिलाने वाला है। फाल्गुन मास आया हुआ देख अनिरुद्ध शंकित हो गए और बुद्धिमानों में श्रेष्ठ मंत्रि प्रवर उद्धव से बोले । अनिरुद्ध ने कहा– मंत्रि प्रवर ! यादवराज उग्रेसन चैत्र में ही यज्ञ करेंगे। हम लोग क्या करें ? अब अधिक दिन शेष नहीं रह गए हैं। इस भूतल पर अश्व का अपहरण करने वाले राजा कितने शेष रह गए हैं। मैं सुनना चाहता हूँ, आप शीघ्र उनके नाम बतावें । उद्धव बोले- हरे ! अब भूतल पर या आकाश में अश्व का अपहरण करने वाले शूरवीर शेष नहीं रह गए हैं। इसलिए अब तुम सोने के हारों से अलंकृत द्वारवाली यादवों की द्वारकापुरी को चलो । उनकी यह बात सुनकर अनिरुद्ध को बड़ा हर...

10. अश्‍वमेध खण्‍ड || अध्याय 52 || श्यामकर्ण अश्व का कौन्तलपुर में जाना और भक्तराज चंद्रहास का बहुत सी भेंट सामग्री के साथ अश्व को अनिरुद्ध की सेवा में अर्पित करना और वहाँ से उन सबका प्रस्थान

10. अश्‍वमेध खण्‍ड || अध्याय 52 || श्यामकर्ण अश्व का कौन्तलपुर में जाना और भक्तराज चंद्रहास का बहुत सी भेंट सामग्री के साथ अश्व को अनिरुद्ध की सेवा में अर्पित करना और वहाँ से उन सबका प्रस्थान श्रीगर्गजी कहते हैं- राजन् ! वहाँ आए हुए घोड़े को देखकर व्रजचंद्र श्रीकृष्ण के दास राजा चंद्रहास ने उसे तत्काल पकड़ लिया और प्रसन्नतापूर्वक उसके भाल पत्र को पढ़ा। नरेश्वर ! उस पत्र को पढ़कर उस महाभगवद्भक्त नरेश ने कहा- अहो ! बड़े सौभाग्य की बात है कि मैं आज भगवान श्रीकृष्ण के पौत्र को अपने नेत्रों से देखूंगा। पता नहीं, पूर्वकाल में मेरे द्वारा कौन सा ऐसा पुण्य बन गया है, जिससे मुझे श्रीकृष्ण तुल्य यदुकुल तिलक अनिरुद्ध के दर्शन का अवसर मिल रहा है। मैंने आज तक माया से मानव शरीर धारण करने वाले भगवान श्रीकृष्ण का दर्शन नहीं किया है। इसलिए मैं प्रद्युम्न कुमार के साथ द्वारका जाऊँगा और वहाँ श्रीकृष्ण, बलराम, प्रद्युम्न तथा उन महाराज उग्रसेन का भी दर्शन करूँगा, जो भगवान श्रीकृष्ण से भी पूजित हैं । ऐसा कहकर राजा चंद्रहास गंध, पुष्प, अक्षत आदि उपचार, दिव्य वस्त्र, दिव्य रत्न और उस घोड़े को भी साथ लेकर माला...

10. अश्‍वमेध खण्‍ड || अध्याय 51 || यादवों का द्वैतवन में राजा युधिष्ठिर से मिल कर घोड़े के पीछे–पीछे अन्यान्य देशों में जाना तथा अश्व का कौन्तलपुर में प्रवेश

10. अश्‍वमेध खण्‍ड || अध्याय 51 || यादवों का द्वैतवन में राजा युधिष्ठिर से मिल कर घोड़े के पीछे–पीछे अन्यान्य देशों में जाना तथा अश्व का कौन्तलपुर में प्रवेश श्रीगर्गजी कहते हैं– नृपेश्वर ! तत्पश्चात् भगवान श्रीकृष्ण यादवों की रक्षा करके सबसे मिलजुल कर रथ के द्वारा कुशस्थलीपुरी को चल दिए। उनके चले जाने पर अनिरुद्ध ने अश्व का यत्नपूर्वक पूजन किया और विजय यात्रा के लिए पुन: उसे बंधन मुक्त कर दिया। छूटने पर वह घोड़ा अनेकानेक देशों को देखता हुआ तीव्र गति से आगे बढ़ा। राजेंद्र ! उसके पीछे वृष्णिवंशी यादव भी वेगपूर्वक चले। दुर्योधन की पराजय सुनकर दूसरे–दूसरे भूपाल महाबली श्रीकृष्ण के भय से अपने राज्य में आने पर भी उस घोड़े को पकड़ न सके । तदनंतर यज्ञ का वह घोड़ा इधर–उधर देखता–सुनता हुआ द्वैत वन में जा पहुँचा, जहाँ राजा युधिष्ठिर भाइयों और पत्नी के साथ वनवास करते थे। उस द्वैतवन में भीमसेन प्रतिदिन हाथियों के समुदायों के साथ उसी तरह क्रीड़ा करते थे, जैसे बालक खिलौनों से खेलता है। उन्होंने वहाँ उस घोड़े को देखा। वह वन बड़ा ही विशाल और घना था। बरगद, पीपल, बेल, खजूर, कटहल, मौलसिरी, छितवन, तिंदुक...

10. अश्‍वमेध खण्‍ड || अध्याय 50 || कौरवों की पराजय और उनका भगवान श्रीकृष्ण से मिलकर भेंट सहित अश्व को लौटा देना

10. अश्‍वमेध खण्‍ड || अध्याय 50 || कौरवों की पराजय और उनका भगवान श्रीकृष्ण से मिलकर भेंट सहित अश्व को लौटा देना श्रीगर्गजी कहते हैं– नृपेश्वर ! उसी समय भोज, वृष्णि और अंधक आदि समस्त यादव तथा मथुरा और शूरसेन प्रदेश के महासंग्राम कर्कश एवं बलवान योद्धा यमुनाजी को पार करके पैरों की धूलि से आकाश को व्याप्त और पृथ्वी को कंपित करते हुए वहाँ आ पहुँचे। घोड़े को सब ओर देखते और खोजते हुए महाबलवान श्रीकृष्ण आदि और अनिरुद्ध आदि महावीर भी आ गए। वृष्णिवंशियों ने दूर से ही वहाँ युद्ध का भयंकर महाघोष, कोदण्डों की टंकार, शतघ्नियों की गूंजती हुई आवाज, शूरों की सिंह गर्जना, शस्त्रों के परस्पर टकराने के चट चट शब्द, कोलाहल और हाहाकार सुना। सुनकर वे बड़े विस्मित हुए। जब उन्हें मालूम हुआ कि यादवों का कौरवों के साथ घोर युद्ध छिड़ गया है तो अनिष्ट की शंका मन में लिए अनिरुद्ध और श्रीकृष्ण आदि यदुकुल शिरोमणि महापुरुष बड़े वेग से वहाँ आए। नरेश्वर ! अनिरुद्ध आदि के साथ हमारी सहायता करने के लिए सेना सहित श्रीकृष्ण आ पहुँचे हैं, यह देखकर साम्ब आदि ने उनको प्रणाम किया। श्रीकृष्ण के पधारने पर रणभेरियां बजने लगीं। शंख...