07. विश्वजित खण्ड || अध्याय 36 || दीप्तिमान द्वारा महानाभ का वध
07. विश्वजित खण्ड || अध्याय 36 || दीप्तिमान द्वारा महानाभ का वध नारदजी कहते हैं- राजन् ! कालनाभ दैत्य के गिर जाने पर दैत्य सेना में बड़ा भारी कोलाहल मचा। तब महानाभ नामक दैत्य ऊँट पर चढ़कर समरांगण में आया। वह मायावी दैत्यराज मुँह से आग उगलने लगा। उस आग से दसों दिशाएँ प्रज्वलित हो उठीं और धरती के वृक्ष जलने लगे। महाराज् ! वीरों के कवच, पगड़ी, कटिबन्ध और अँगरखा आदि मूँज के फूल (भुआड़ी) तथा रुई के समान जल उठे। राजन् ! समुद्र तटवर्ती नगरों के बने हुए पीले, लाल, सफेद, काले, चितकबरे और सूक्ष्म झूलों तथा हेम-रत्न खचित कशमीरी कालीनों सहित बहुत से हाथी उस समरांगण में दावा नलसे दग्ध होने वाली वृक्षों सहित पर्वतों की भाँति जल रहे थे। मस्तक पर धारण कराये गये रत्नों, चामरों, हारों और सुनहरे साजबाजों के साथ जलते हुए घोड़े उस युद्धभूमि में दावाग्नि से दग्ध होने वाले हरिणों की भाँति उछलते और चौकड़ी भरते थे। अपनी सेना को भय से व्याकुल देख श्रीकृष्ण कुमार दीप्तिमान ने उस मायामयी आग को बुझाने के लिये पार्जन्यास्त्र का संधान किया। फिर तो उस बाण से प्रलयकाल के मेघों की भाँति नील जलधर प्...