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05. मथुराखण्‍ड || अध्याय 04 || श्रीकृष्‍ण का गोपियों के घरों में जाकर उन्‍हें सान्‍त्‍वना देना तथा मार्ग में रथ रोककर खड़ी हुई गोपांगनाओं को समझाकर उनका मथुरापुरी की ओर प्रस्थित होना

गर्ग संहिता मथुराखण्‍ड : अध्याय 4  श्रीकृष्‍ण का गोपियों के घरों में जाकर उन्‍हें सान्‍त्‍वना देना तथा मार्ग में रथ रोककर खड़ी हुई गोपांगनाओं को समझाकर उनका मथुरापुरी की ओर प्रस्थित होना श्रीनारदजी कहते हैं- राजन् ! इस प्रकार कहती हुई गोपांग्‍नाओं के अत्‍यंत विरह-केश को जानकर भगवान श्रीकृष्‍ण उन सबके घरों में गये। मिथिलेश्वर! जितनी व्रजांग्‍नाएँ थी, उतने ही रूप धारण करके भगवान श्रीहरि ने स्‍वयं सबको पृथक-पृथक समझाया। श्रीराधा के भवन में जाकर देखा कि वे सखियों से घिरी हुई एकान्‍त स्‍थान मूर्च्छित पड़ी है, तब उन्‍होनें मधुर स्‍वर में मुरली बजायी। वंशी की ध्‍वनि सुनकर श्रीराधा सहसा आतुर होकर उठीं। उन्‍होंने आँख खोलकर देखा तो श्रीगोविन्‍द सामने उपस्थित दिखायी दिये। जैसे पद्यिनी कमलिनी-कुल-वल्‍लभ सूर्य का दर्शन करके प्रसन्‍न हो जाती है, उसी प्रकार पद्यिनी नायिका श्रीराधा अपने प्राणवल्‍लभ को सामने देखकर आनन्‍द में मग्‍न हो गयीं और उन्‍होंने उठकर वहाँ पधारे हुए श्‍याम सुन्‍दर के लिये सादर आसन दिया। कमलनयनी श्रीराधा के मुख पर आँसुओं की धारा बह रही थी। वे अत्‍यन्‍त दीन होकर शोक कर रही थीं, ...