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06. द्वारकाखण्ड || अध्याय 21 || तृतीय दुर्ग के द्वार-देवताओं के दर्शन और पूजन की महिमा तथा पिण्‍डारक-तीर्थ का माहात्‍म्‍य

06. द्वारकाखण्ड || अध्याय 21 || तृतीय दुर्ग के द्वार-देवताओं के दर्शन और पूजन की महिमा तथा पिण्‍डारक-तीर्थ का माहात्‍म्‍य श्रीनारदजी कहते हैं- राजन्! तृतीय दुर्ग के पूर्वद्वार पर महाबली हनुमानजी अहर्निश पहरा देते हैं। जो मनुष्‍य वहाँ महाबली भगवद्भक्‍त हनुमानजी का दर्शन कर लेता है, वह हनुमानजी की ही भाँति महान भगवद्भक्‍त होता है।  इसी प्रकार दक्षिणद्वार की सुदर्शनचक्र दिन-रात रक्षा करता है। राजन् ! उस सुदर्शन का चित्त सदा श्रीकृष्‍ण में ही लगा रहता है। उसके दर्शनमात्र से मानव श्रीहरि का उत्तम भक्‍त होता है। सुदर्शनचक्र उस भक्‍त की भी सदा रक्षा किया करता है।  इसी तरह पश्चिमद्वार की बलवान ऋक्षराज जाम्‍बवान रक्षा करते हैं। राजन् ! वे निरन्‍तर भगवद्भजन में लगे रहते हैं। उन महाबली भगवदभक्त जाम्‍बवान् का दर्शन करके मनुष्‍य इस लोक में चिरंजीवी तथा श्रीहरि का भक्‍त होता है। इस प्रकार महाबली विष्‍वक्सेन उत्तर द्वार की अहर्निश रक्षा करते हैं। राजन् ! श्रीकृष्‍ण के विशाल हृदय हैं। उनके दर्शनमात्र से मनुष्‍य कृतार्थ हो जाता है।  दुर्ग से बाहर ‘पिण्‍डारक-तीर्थ’ है, उसकी महिमा सुनो...