04. माधुर्य खण्ड || अध्याय 15 || बर्हिष्मतीपुरी आदि की वनिताओं का गोपीरूप में प्राकट्य तथा भगवान के साथ उनका रासविलास, मांधाता और सौभरिके संवाद में यमुना-पञ्चांग की प्रस्तावना
श्री गर्ग संहिता 04. माधुर्य खण्ड || अध्याय 15 || बर्हिष्मतीपुरी आदि की वनिताओं का गोपीरूप में प्राकट्य तथा भगवान के साथ उनका रासविलास, मांधाता और सौभरिके संवाद में यमुना-पञ्चांग की प्रस्तावना श्रीनारदजी कहते हैं:- राजन्, व्रज में शोणपुर के स्वामी नन्द बडे़ धनी थे। मिथिलेश्वर, उनकी पत्नियो के गर्भ से समुद्रसम्भवा लक्ष्मी जी की वे सखियाँ उत्पन्न हुईं, जिन्हे मत्स्यावतारधारी भगवान से वैसा वर प्राप्त हुआ था। नरेश्वर, इनके सिवा और भी विचित्र औषधियाँ, जो पृथ्वी के दोहन से प्रकट हुई थीं, वहाँ गोपीरूप में उत्पन्न हुई। बर्हिष्मतीपुरी की वे नारियाँ भी जिन्हें महाराज पृथु का वर प्राप्त था, जातिस्मरा गोपियों के रूप में व्रज में उत्पन्न हुई थीं तथा नर-नारायण के वरदान से अप्सराएँ भी गोपीरूप में प्रकट हुई थीं। सुतलवासिनी दैत्यनारियाँ वामन के वर से तथा नागराजों की कन्याएँ भगवान शेष के उत्तम वर से व्रज में उत्पन्न हुईं। दुर्वासा मुनि ने उन सबको अद्भूत 'कृष्णा-पंचांग' दिया था, जिसमें यमुना जी की पूजा करके उनहोंने श्रीपति का वररूप में वरण किया। एक दिन की बा...