10. अश्वमेध खण्ड || अध्याय 56 || राजा द्वारा यज्ञ में विभिन्रन बन्धु-बान्धवों को भिन्न-भिन्न कार्यों में लगना, श्रीकृष्ण का ब्राह्मणों के चरण पखारना, घी की आहुति से अग्निदेव को अजीर्ण होना, यज्ञपशु के तेज का श्रीकृष्ण में प्रवेश, उसके शरीर का कर्पूर के रूप में परिवर्तन, उसकी आहुति और यज्ञ की समाप्ति पर अवभृथ स्नान
10. अश्वमेध खण्ड || अध्याय 56 || राजा द्वारा यज्ञ में विभिन्रन बन्धु-बान्धवों को भिन्न-भिन्न कार्यों में लगना, श्रीकृष्ण का ब्राह्मणों के चरण पखारना, घी की आहुति से अग्निदेव को अजीर्ण होना, यज्ञपशु के तेज का श्रीकृष्ण में प्रवेश, उसके शरीर का कर्पूर के रूप में परिवर्तन, उसकी आहुति और यज्ञ की समाप्ति पर अवभृथ स्नान श्रीगर्गजी कहते हैं- महाराज ! महात्मा राजा उग्रसेन के यज्ञ में उनकी परिचर्या में प्रेम के बंधन से बंधे हुए समस्त बन्धु-बान्धव लगे रहे। उन यादवराज से विभिन्न कर्मों में सगे- संबंधी भाई-बंधुओं को लगाया। भीमसेन रसोईघर के अध्यक्ष बनाये गये। धर्मराज युधिष्ठिर को धर्मपालन संबंधी कर्म में नियुक्त किया गया। राजा ने सत्पुरुषों की सेवा शुश्रूषा में अर्जुन को, विभिन्न द्रव्यों को प्रस्तुत करने में नकुल को, पूजन कर्म में सहदेव को और धनाध्यक्ष के स्थान पर दुर्योधन को नियुक्त किया। दानकर्म में दानी कर्ण को, परोसने के कार्य में द्रौपदी को तथा रक्षा के कार्य में श्रीकृष्ण के अठारह महारथी पुत्रों को लगाया। तत्पश्चात भूपाल ने युयुधान, विकर्ण, हदीक, विदुर, अक्रूर और उद्धव को भी अन...