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06. द्वारकाखण्ड || अध्याय 14 || द्वारका क्षेत्र के समुद्र तथा रैवतक पर्वत का माहात्‍म्‍य

06. द्वारकाखण्ड || अध्याय 14 || द्वारका क्षेत्र के समुद्र तथा रैवतक पर्वत का माहात्‍म्‍य श्रीनारदजी कहते हैं- सबको सम्‍मान देने वाले नरेश ! अब द्वारावती और समुद्र के माहत्‍म्‍य का वर्णन सुनो, जो सब पापों को हर लेने वाला, पुण्‍यदायक तथा उन तीर्थों में स्‍नान का फल देने वाला है।  महीपते ! जो वैशाख मास की पूर्णमासी को व्रत रहकर, स्‍नान पूर्वक नदीपति समुद्र का विधिवत पूजन और उसे नमस्‍कार करके रत्‍नों का दान करता है, उसके शरीर में तीनों देवता (ब्रह्मा, विष्‍णु, महेश) निवास करते हैं तथा उसके दर्शन मात्र से मनुष्‍य कृतार्थ हो जाता है। इतना ही नहीं– उसके शरीर के स्‍पर्श से तत्‍काल ब्रह्महत्‍या छूट जाती है तथा वह जहाँ-जहाँ जाता है वहाँ-वहाँ की भूमि मंगलमयी हो जाती है। जगत वध करने वाला पापी मनुष्‍य भी उसका दर्शन करके करने पर अपने पाप-समूह का उच्‍छेद कर डालता और परम मोक्ष को प्राप्‍त होता है।  मानद ! अब रैवत पर्वत का माहात्‍म्‍य सुनो, जो समस्‍त पापों को दूर करने वाला, पुण्‍यदायक तथा भोग और मोक्ष प्रदान करने वाला है। गौतम का पुत्र मेधावी बड़ा बुद्धिमान और विष्‍णु भक्‍त था। उसने सौ अयुत वर...