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02. वृन्दावन खण्ड || अध्याय 25 || भगवान शिव और आसुरि मुनि जी का गोपीरूप से रासमण्‍डल में भगवान श्रीकृष्ण का दर्शन और स्तवन करना तथा उनके वरदान से वृन्दावन में नित्य-निवास पाना

श्री गर्ग संहिता 02. वृन्दावन खण्ड || अध्याय-25 || भगवान शिव और आसुरि मुनि जी का गोपीरूप से रासमण्‍डल में भगवान श्रीकृष्ण का दर्शन और स्तवन करना तथा उनके वरदान से वृन्दावन में नित्य-निवास पाना श्रीनारद जी कहते हैं:- राजन, भगवान शिव आसुरि मुनि के साथ सम्पूर्ण ह्रदय से ऐसा निश्चय करके भगवान श्रीकृष्ण दर्शन के लिये व्रज-मण्‍डल में गये।  वहाँ की भूमि दिव्य वृक्षों, लताओं, कुंजों और गमुटियों से सुशोभित थी; उस दिब्य भूमिका दर्शन करते हुए दोनों ही यमुना तट पर गये। उस समय अत्यंत बलशालिनी गोलोकवासिनी गोप-सुन्दरियाँ हाथ में बेंत की छड़ी लिये वहाँ पहरा दे रही थी। उन द्वारपालिकाओं ने मार्ग में स्थित होकर उन्हें बल पूर्वक रासमण्‍डल में जाने से रोका। भगवान शिव और आसुरी मुनि बोले:- ‘हम श्रीकृष्ण दर्शन की लालसा से यहाँ आये है।’ नृपेश्रेष्ठ, तब राह रोककर खड़ी द्वारपालिकाओं ने उन दोनों से कहा:- विप्रवरो, हम कोटि-कोटि गोपांगनाएँ वृन्दावन को चारों ओर से घेर कर निरंतर रासमण्‍डल की रक्षा कर रही हैं; इस कार्य में श्यामसुन्दर श्रीकृष्ण ने ही हमें नियुक्त किया है।  इस एकांत रासमण्‍डल में एकमात्र श्रीक...